संदीप कुमार सिंह 03 Jul 2026 ग़ज़ल समाजिक मेरी यह ग़ज़ल सामाजिक है बहुत सारे ऐसे युवा होते हैं जो करना तो बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन किसी न किसी मजबूरी में अपने सपनों को साकार नहीं कर पाता है. 68 0 Hindi :: हिंदी
मैं एक टूटा हुआ सितारा हूँ। सागर की मौजों का किनारा हूँ। फिर भी करती दुनियाँ मुझे पसंद, दर्द के मारों का एक सहारा हूँ। कास मेरे ही हिसाब से सब चलते, हारे हुये दोस्तों का मैं एक बसेरा हूँ। मुझ से मिली और वह रोने लगी, ज़ख्मी दिलों का य़ार मैं प्यारा हूँ। कहीं मातम तो कहीं शहनाई धुन, मगर सबकी नजरों का मैं दुलारा हूँ। संसार में अभी अवला कम नहीं है, इन अवलों के लिए मैं गुजारा हूँ। महफ़िल में मेरे से चार चाँद लग गया, क्योंकी शायरी का एक मैं पिटारा हूँ। दिल में लगी आग को मैं बुझाता हूँ, नशिली खुशबू है मुझमें मैं मोगरा हूँ। चाँद तो चाँदनी के लिए मशहूर है, दिल से हर शायरी में उसे मैं पुकारा हूँ। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह*Author*
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....