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जन जागरण

Raj Ashok 20 May 2024 आलेख हास्य-व्यंग जनमत 32390 0 Hindi :: हिंदी

नहीं कोई एक शब्द बोलता ।
खामोश बैठे हैं। जनार्दन जननायक निर्माण करता  ।
सृष्टि का रचयिता भी सोचता है ।
आखिर इन महानायकों का इस दुनिया में काम क्या है। 
शब्द तो इनके ऐसे हैं। जगा देते हैं अर्निद्रा 
से पर बदलता कुछ नहीं है।
ज़माने की बेरुखी नर्वस करती है।
हर उस नायक को जो वास्तव में एक जननायक है।
अब तो परिवर्तन भी प्रेरणा प्रदान नहीं करता ।
हम बदलाव किसे कहें ...........
एक अर्धनग्न महात्मा जिसने आजादी के सूर घर घर पहुंचाए  
आज अर्धनग्न होता ये संस्कृति का स्वरूप क्या बदलाव चाहें।
किस फर्क में उलझे हैं।
हम आज मानवता का कोई मापदंड नहीं
यह भाव यह स्वरूप तो सच्चा है ।
पर कामयाबी के हौंसले क्या है ।
अब तो हर दिल बटता है ।
जगीरो के जैसे ..............

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