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जिंदगी एक कटार

Pratibha Khadekar 06 Jan 2025 आलेख दुःखद प्रतिभा खडेकार 27287 0 Hindi :: हिंदी

जिंदगी एक कटार 
                                   रचना -प्रतिभा खडेकार 

ए कहानी गरीबी की है किसी एक गांव में घर पर कुछ न होने पर माता-पिता लड़की का हाथ किसी के भी हाथों में थमा देते हैं,,
आशा एक ऐसी ही लड़की है जिस पर एक लेख लिखा है आशा के जन्म से ही आशा की बदनसीबी शुरू हुई है,, आशा 2 साल की थी जब उसकी मां उसे छोड़ गई उसके पिता ने उसे पाल पोसा और बड़ा किया आशा और उसकी बड़ी बहन पुष्पा दोनों थे,,

   आशा के पिता को डैम की शिकायत होने की वजह से अपनी बेटियों की परवरिश ठीक से नहीं कर पाए और इसी वजह से उन्होंने अपनी बेटियों की जल्द शादी करने का फैसला लिया,, 
,,,,, बड़ी बेटी पुष्पा की शादी मंदिर में सीधी-साधी रीति से करवाई,,
और उसे विदा किया,,
अब आशा की बारी है 
आशा-आपको दम है पिताजी और मैं कैसे शादी कर लूं नहीं पिताजी नहीं मैं शादी नहीं करूंगी रोते हुए आशा हूं का 
पिता वामनावतार -बेटी अगर भी मर जाता हूं तो किसके सहारे जाउ छोड़ तुझको,,
आशा -बाबा रोते हुए आशा शादी के लिए तैयार तो हो जाती है अगर जी नहीं मानता आज करो अपने बाबा को कहती है बाबा मत कीजिए मेरी शादी 

,,,, आशा को जो लड़का देखने आता है वह लड़का रिश्ते में आशा का दूर का मामा लगता है फिर भी बाबा रिश्ता जोड़ ही लेते हैं रिश्ता जोड़ते ही लड़का बजरंगबली के मंदिर जाता है शादी के लिए पैसे नहीं होते,, इसलिए बजरंगबली से प्रार्थना में पैसे मांगता है इतने में एक औरत अगरबत्ती के खड्डे से अगरबत्ती निकालकर खड्डा झड़ से फेंक देती है ,,और वह खड़ा लड़के के पैरों के पास आ रुकता है लड़के का नाम दीपक है,,
दीपक वह खडड़ा उठाकर उस पर नंबर होता है ,,उस नंबर का सट्टा लगता है ,,और वही नंबर आकर पैसे ले आता है उन्ह  पैसों से अपने शादी के कपड़े दुल्हन के कपड़े की खरीदी करता है,, पूरी तरह सादे रिती रिवाज में उनकी शादी संपन्न होती है,, आशा के पिता एक नारियल और शव्वा रुपए देकर विदा करते हैं,,

शादी के बाद आशा के सास ससुर आशा को समझते है,, तुम इतनी खूबसूरत इस नालायक को संभाल लेना बेटी आजू-बाजू वाली सब औरतें आशा को देखकर कहती है इसे कैसे मीली इतनी अच्छी लड़की सब हैरान हो जाते हैं
,,,, शादी की रात तो बीड़ी का धुआं और कुछ दिन बाद  शराब की बदबू आशा का  दम घुटने लगता है ,,मगर पति परमेश्वर है ना करती भी क्या आशा कहीं बार दीपक को समझती है ,,वह बिडी ना पिए सिगरेट शराब न पिए मगर दीपक उसे दो चांटा लगा कर कहता है अपना काम कर आइंदा मेरे मुंह से मुंह नहीं लगाना,,

,,,,,,,, आशा पेट से है दीपक का कहना है ए लड़का होना चाहिए लड़की हुई ना तो तलाक ले लूंगा दीपक की इस बातों ने आशा की नींद उड़ाई डिलीवरी हुआ 
,,,, नर्स की जुबान से लड़का हुआ यह सुनकर  आशा को चैन मिला,,
बच्चा आंगन में खेलने लगा उसका नाम विजय रखा फिर से आशा पेट से रही फिर से दीपक वही दोहरा ने लगा लड़की नहीं होनी चाहिए लड़की नहीं होनी चाहिए लड़की हुई तो तलाक ले लूंगा आशा का मां धक-धक करने लगा,, आशा की नानी उसे ले जाने आई ,,चल मेरे साथ इस नर्क से तुझे निकाल ले जाऊ,कहीं दूर आशा का कहना था नहीं नानी अब तो यही मेरा स्वर्ग है नानी मरते दम तक अब यही जीना है और यही मरना है,,
,,,,,,,, विजय बेटा 2 साल का हुआ और डिलीवरी ए लड़का हुआ आशा को फिर से तसल्ली मिली दूसरा बेटा 6 महीने का था आशा की सास चल पड़ी,, और वहीं से 15 दिन बाद आशा के ससुर चल पड़े आशा की सास हरदम रहती थी,, आसला पासला डाव्या पाया वर घासला,, मैं निकालूं आगे तू मेरे पीछे 
     ,,,, जो तकलीफ इनकी गुजरने पर आशा को हुई को बेहद ही दुखत ,,क्योंकि अब बड़ों का साया घर से हट चुका था अब दीपक हर दिन आशा को मारपीट  गलियां रोड पर सरे आम बदनाम करता था,, आशा फिर भी नहीं डरी उसे गुजर जो करना था उसके पिता की भी डेट हो गई,,
       अब तो पीछे कोई नहीं रहा दीपक के दोस्तों ने दीपक को शराब पिलाकर घर के दस्तावेज पर सिग्नेचर कर को घर उनके नाम कर लिया अब दीपक अपने पत्नी और बेटों को लेकर किराए के मकान में रहने लगा,, दीपक आशा को पारिवारिक ऑपरेशन करने से मना करता था तीसरी दफा डिलीवरी आई और तीसरी बार भी आशा को लड़का हुआ,,
  ,,,,,,, फिर से आशा को दिन गए आशा को पता भी नहीं चला पति-पत्नी के झगड़े में आशा ने मिट्टी का तेल पी लिया और उल्टियां होने लगी जब हॉस्पिटल गई तब पता चला 2 महीने हो चुके इस बार आशा को कहीं तकलीफ के झेलनी पड़ी घर में जो खाने के लिए कुछ ना था तो आशा ने खेती भी की और आशा को नवा महीना चल रहा,,
दीपक पानी लानी नल पर गया वहां किसी के साथ झगड़ा कर पानी की बाटलिया खाली ले आया,, घर लिप ते समय आशा के पेट में दर्द उठा आशा बाजू वाले काकी को साथ ले हॉस्पिटल गई इस बार आशा को लड़की हुई जैसी जिंदगी थम गई हो,, साथ वाली काकी घर जाकर दीपक को बताने लगी तुम्हें लड़की हुई है बेटा,,
,,,,, यह सुनकर दीपक बोल अच्छा हुआ तीन भाइयों को एक बहन मिली यह बात काकी हॉस्पिटल जाकर आशा को बताने लगी तब आशा की जान में जान आई,, दीपक ने मोहल्ले में जलेबी भी बाटी...
आशा बेटी को लेकर जब घर आई जोरों की बारिश बिजली की करकड़ाहट तूफान हवाएं पेड़ों का गिरना और घर पर ताला इस हालत में आशा कहां जाएंगे वह अपने ही घर के द्वार पर बेटी को झाके  हुए बैठी,,

यहां से आशा की गरीबी तो समाप्त होगी,,  उसकी बदनसीबी खत्म होकर जो ए नन्ही सी कली है इसकी कहानी शुरू होगी,, जीवन तो बहुत बड़ा है हर बार सूरज निकालकर डूब जाना है,, आ आ आ आ आ आ आ आ आ 

                       समाप्त 
                                                                    प्रतिभा खडेकार

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