डॉ राजेंद्र यादव आजाद 04 Oct 2025 आलेख समाजिक कोचिंग संस्थानों का भ्रमजाल 12744 0 Hindi :: हिंदी
कोचिंग संस्थानों का भ्रामक प्रचार और शिक्षा का व्यापारीकरण भारत की शिक्षा प्रणाली आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ ज्ञान, संस्कार और मानवीय मूल्य धीरे–धीरे बाज़ार की चमक–दमक में खोते जा रहे हैं। शिक्षा अब केवल “सीखने” की प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि एक महँगी वस्तु बन गई है जिसे खरीदने की क्षमता रखने वाला ही प्राप्त कर सकता है। एक समय था जब शिक्षक को गुरु कहा जाता था, और शिक्षण संस्थान समाज के बौद्धिक विकास का केंद्र माने जाते थे। परंतु आज शिक्षा का केंद्र “लाभ और ब्रांडिंग” बन चुका है। इस परिवर्तन का सबसे जीवंत उदाहरण हैं — कोचिंग संस्थान, जो हर शहर, हर गली और हर ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर फैल चुके हैं। हाल ही में जब CCPA द्वारा प्रसिद्ध सिविल सेवा कोचिंग संस्थान ‘दृष्टि IAS’ पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया, तो देशभर में चर्चा छिड़ गई जिसका कारण है भ्रामक प्रचार। यह मामला सिर्फ एक संस्था का नहीं, बल्कि पूरे उस तंत्र का है जिसने शिक्षा को एक मुनाफ़ाखोरी का कारोबार बना दिया है। उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने दिल्ली स्थित कोचिंग संस्था दृष्टि IAS पर ₹5,00,000 का जुर्माना ठोका। आरोप था कि संस्था ने अपने विज्ञापनों में असत्य और भ्रामक दावे किए जैसे, “हमारे छात्र हर साल टॉप रैंक लाते हैं”, “IAS टॉपर दृष्टि से पढ़े”, “100% सफलता की गारंटी”, इत्यादि। जब जांच हुई, तो पाया गया कि इनमें से कई दावे आंशिक रूप से गलत, भ्रम फैलाने वाले, या अधूरे आँकड़ों पर आधारित थे। इस पर राष्ट्रीय उपभोक्ता मंच (CCPA) ने यह कहते हुए जुर्माना लगाया कि “शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में झूठे प्रचार से अभिभावक और विद्यार्थी दोनों भ्रमित होते हैं, जो उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है।” आज हर छोटा-बड़ा कोचिंग सेंटर अपने आपको “No.1” बताता है। हर जगह चमकते पोस्टर, यूट्यूब वीडियो, होर्डिंग्स, और टॉपर्स के फोटो सब मिलकर एक “सपनों का भ्रम” रचते हैं। माता–पिता सोचते हैं कि अगर उनका बच्चा इन संस्थानों में जाएगा तो IAS, IPS, NEET या IIT में चयन निश्चित है। पर वास्तविकता यह है कि इन संस्थानों में पढ़ने वाले लाखों छात्रों में से केवल 1–2 प्रतिशत ही चयन पाते हैं। बाकी 98 प्रतिशत छात्र तनाव, असफलता और आर्थिक बोझ के साथ घर लौटते हैं। भारत में कोचिंग उद्योग अब 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बाज़ार बन चुका है। जयपुर, कोटा, दिल्ली, पटना, लखनऊ, भोपाल — हर बड़े शहर में हजारों संस्थान हैं जो NEET, JEE, UPSC, SSC, NET, BANK, CAT जैसी परीक्षाओं की तैयारी करवाते हैं। इन संस्थानों का मुख्य हथियार है — विज्ञापन और ब्रांडिंग। “हमारे टॉपर हमारे हैं”, “यहाँ से पढ़ो, सफलता निश्चित”, “All India Rank 1 यहीं से”, “Demo Class में ही सफलता का रहस्य जानो” — ये नारे हर दीवार और मोबाइल स्क्रीन पर गूँजते हैं। कई संस्थान ऐसे छात्रों की तस्वीरें अपने विज्ञापन में लगाते हैं जो कभी वहाँ पढ़े ही नहीं। टॉपर की फोटो के साथ लिखा जाता है “हमारे छात्र की सफलता”, जबकि छात्र ने केवल एक टेस्ट सीरीज़ दी थी। “100% Selection Guarantee” जैसे वाक्य छात्रों को भ्रमित करते हैं। यूट्यूब और सोशल मीडिया पर Influencers के माध्यम से प्रचार करवाना, जिनके वीडियो देखने से लगता है कि सफलता बस एक कोर्स की दूरी पर है। हर साल लाखों छात्र अपने घर छोड़कर कोटा, दिल्ली या जयपुर जैसे शहरों में आते हैं। माता–पिता अपनी जमा पूंजी खर्च करते हैं, जमीन बेचते हैं, लोन लेते हैं — इस उम्मीद में कि “हमारा बच्चा IAS बनेगा” या “डॉक्टर बनेगा।” परंतु जब संस्थान अपने विज्ञापनों में “100% सफलता” दिखाते हैं, तो वह अभिभावकों के मन में एक अवास्तविक आशा पैदा करते हैं। और जब वह पूरी नहीं होती, तो उसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। कोटा जैसे शहर में हर साल 20 से अधिक छात्रों की आत्महत्या, इसी दबाव का परिणाम है। शिक्षक का काम प्रेरणा देना है, भ्रम बेचना नहीं। लेकिन जब शिक्षा को कंपनी मॉडल में ढाला गया — जहाँ “Admission Target” और “Profit Margin” तय होने लगे — वहाँ शिक्षा की आत्मा मर गई। दृष्टि IAS पर लगा जुर्माना इस मरती आत्मा की एक झलक है। पर सवाल यह है कि — क्या केवल दृष्टि ही दोषी है? क्या NEET और JEE कोचिंग संस्थान, PMT ट्रेनिंग अकादमी, NET और SSC संस्थान इस खेल में पीछे हैं? उत्तर है — नहीं। बल्कि, यह एक संगठित शिक्षा बाज़ार का नेटवर्क बन चुका है जहाँ हर संस्था “सफलता बेचने” का कारोबार करती है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (2019): के तहत, भ्रामक विज्ञापन करने वाली कंपनियों पर जुर्माना लगाया जा सकता है। धारा 2(28) में “भ्रामक विज्ञापन” की परिभाषा दी गई है “ऐसा कोई भी विज्ञापन जो झूठी जानकारी देकर उपभोक्ता को भ्रमित करे या उससे अनुचित लाभ प्राप्त करे। दृष्टि IAS केस इसी कानून के तहत कार्रवाई का उदाहरण बना। सरकार को कोचिंग संस्थानों के लिए मानक दिशा-निर्देश (Guidelines) तय करने चाहिए, जैसे कि सफलता के आँकड़े केवल सत्यापित होने पर ही प्रकाशित हों। “गैर-छात्रों” की तस्वीरें विज्ञापन में न लगाई जाएँ। कोचिंग शुल्क और रिफंड नीति पारदर्शी हो। छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसलिंग अनिवार्य की जाए। यूट्यूब और इंस्टाग्राम आज कोचिंग प्रचार के सबसे बड़े प्लेटफ़ॉर्म हैं। यहाँ Influencers और Paid Reviewers बड़ी राशि लेकर संस्थानों की “PR” करते हैं। इन सबकी निगरानी जरूरी है। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि मानव निर्माण है। पर आज की कोचिंग संस्कृति बच्चों को सिर्फ “रैंक मशीन” बना रही है। अभिभावक भी अनजाने में इस दौड़ का हिस्सा बन गए हैं। हर घर में यह बात सुनाई देती है — > “फलाँ संस्थान में भेजो, वहीं से बच्चे IAS बनते हैं।” इस मानसिकता ने “शिक्षा के मूल्य” को “ब्रांड” में बदल दिया है। शिक्षा को बाज़ार से बचाना होगा दृष्टि IAS पर जुर्माना केवल एक चेतावनी है। यह शिक्षा जगत के उन सभी खिलाड़ियों को संदेश देता है जो सफलता बेचकर भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। आज जरूरत है कड़े नियमों की,नैतिक शिक्षा की पुनर्स्थापना की, और समाज में यह समझ फैलाने की कि “कोचिंग नहीं, मेहनत सफलता की कुंजी है।” शिक्षा को फिर से संस्कार और सृजन का माध्यम बनाना होगा, न कि प्रचार और लाभ का खेल। डॉ. राजेंद्र यादव ‘आज़ाद’ दौसा मोबाइल 9414271288
डॉ राजेंद्र यादव आजाद 12 अगस्त 1971 बेवल ज�...