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महात्मा ज्योतिबा फुले

डॉ राजेंद्र यादव आजाद 13 Apr 2025 आलेख समाजिक महात्मा ज्योतिबा फुले 15554 0 Hindi :: हिंदी

11 अप्रैल 2025 को महात्मा ज्योतिबा फुले की 198 वी जयंती देश भर में माली सैनी समाज व अन्य समाजों द्वारा मनाई गई  । महात्मा ज्योतिबा फुले एक महान समाज सुधारक संत विचारक लेखक दार्शनिक हुए हैं  ।11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र राज्य के पुणे में एक साधारण परिवार में जन्मे फूले ने अपने बाल्यकाल  से ही समाज में हो रहे सामाजिक भेदभाव को देखा  और झेला भी जिसके कारण   वे  जीवन भर समाज में व्याप्त जाति प्रथा व भेदभाव के खिलाफ लड़ते रहे।  अपनी शिक्षा प्राप्त करने के बाद महिलाओं व पिछडे  तबके के उत्थान के लिए उन्होंने काम करना शुरू किया।              1848 में पुणे महाराष्ट्र में बालिका विद्यालय की शुरुआत कर समाज की पिछड़ी महिलाओं के उत्थान की अलख जगाई।समाज की अन्य महिलाओं के साथ ही ज्योतिबा फुले की पत्नी सावित्रीबाई फुले ने भी शिक्षा प्राप्त कर अपने पति के कंधे से कंधा मिलाकर अध्यापन का कार्य प्रारंभ किया।  समाज में व्याप्त बाल विवाह के विरुद्ध बिगुल बजाकर सत्यशोधक समाज नाम की सामाजिक संस्था का गठन कर समाज में व्याप्त भेदभाव व असमानता को दूर करने का बीड़ा महात्मा ज्योतिबा फुले ने उठाया । पिछड़े समाज के लिए अनेकों शैक्षिक संस्थानों की स्थापना ज्योति बा ने की । उस समय के दलित पिछडे समाज में ज्योति बा  ने अनेकों क्रांतिकारी बदलाव किये लेकिन आज उन्हीं का माली सैनी समाज धर्मांन्ध  होकर पाखंडवाद और अंधविश्वास में इस कदर डूब गया है कि उनकी जन्म जयंती के अवसर पर धार्मिक कलश यात्राएं निकाल रहा है ज्योतिबा फुले का मंदिर बनाने के लिए समाज से चंदा इकट्ठा कर रहा है जबकि महात्मा ज्योतिबा फुले जीवन पर्यंत ऐसे आडम्बरों का विरोध करते रहे । आज आवश्यकता है कि माली सैनी समाज के साथ ही अन्य दलित व पिछडा समुदाय महात्मा ज्योतिबा फुले की बेहतरीन पुस्तक गुलामगिरी को पढे और उनकी बतायी शिक्षा और उनके विचारों का अनुसरण करते हुए समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर कर शिक्षा की अलख जाये तभी हम उन्हें अपनी सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएंगे।जीवन भर दलित पिछडो को जागृत करने वाले महात्मा ज्योतिबा फुले  का 28 नवंबर 1890 को पुणे में देहांत हो गया लेकिन वे दलित पिछड़ों को जितना जागृत करके गए उतना ही दलित पिछड़ा समाज आज धार्मिक बनकर पाखंड और अंधविश्वास में डूब कर अपना जीवन बर्बाद कर रहा है  जिसका जीता जागता उदाहरण है 11 अप्रैल 2025 को देश भर में फुले जयंती पर निकाली गई कलश यात्राएं । अगर इस दिन उनके विचारों पर पत्र वाचन होता विद्वानों को बुलाकर उनकी पुस्तक गुलामगिरी व उनकी शिक्षाओं की जानकारी समाज में दी जाती तो एक नई सामाजिक क्रांति का संचार होता लेकिन यह दुर्भाग्य है दलित और पिछड़ों का कि वह महात्मा ज्योतिबा फुले के बताएं रास्ते पर नहीं चल कर पाखंड में अंधविश्वास में डूबे हुए हैं। महात्मा ज्योतिबा फूल और अंबेडकर के विचारों को जीवंत रखने वाले दौसा के वर्तमान विधायक दीनदयाल बैरवा ने दौसा जिले के  गांव  ढिगारिया कपूर में संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर की मूर्ति के अनावरण में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि दलित आदिवासी में पिछड़े वर्ग को मंदिर मस्जिद की तरफ जाने की बजाय शिक्षा के मंदिरों की तरफ बढ़ना चाहिए तभी इस तबके का भला हो सकता है । यही बात वर्षों पूर्व महात्मा ज्योतिबा फुले ने कही थी लेकिन आज दलित आदिवासी और पिछड़ा वर्ग इनकी बातों को भूल गया है जिसके कारण समाज मैं अंधविश्वास व  पाखंडवाद घटने की बजाय दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है । आज समाज को आवश्यकता है दलित पिछड़े महापुरुषो के बताए रास्ते पर चलने की ना की उनकी जन्म जयंती के अवसर पर कलश यात्रा निकालने की । डॉ राजेंद्र यादव आजाद दौसा राजस्थान मोबाइल 941427 1288

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