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मजबूती का नाम महात्मा गांधी

नितिश सरोज पाण्डेय 11 Feb 2025 आलेख राजनितिक गाँधी, भारत, सत्य, अहिंसा, 24025 0 Hindi :: हिंदी

बचपन से ही एक वाक्य सुनता आ रहा हूँ, "मजबूरी का नाम महात्मा गांधी" । जब भी कोई इंसान परिस्थितियों के आगे हार मान जाता है तो इस वाक्य को दोहरा कर खुद को परेशानी के आगे मजबूर बता देता है। 

मेरे मन में ये बात हमेशा बनी रही कि जितना मैंने बापू को पढ़ा और सुना है मुझे कोई भी ऐसा प्रसंग नहीं मिला जब बापू ने हालत के आगे मजबूर होकर हार मान ली हो और परिस्थिति से समझौता कर चुके हों। उन्होंने  हमेशा अपने सिद्धांतों का पूरी इमानदारी के साथ पालन किया।

गांधी एक नाम या उपनाम मात्र नहीं है ये एक विचारधारा एक सोच है । गांधी के दर्शन को समझना उतना ही लाभदायी है जितना गीता के ज्ञान को अपने जीवन में अपनाना।  इन्होने अपना समस्त जीवन व्यापक खोज में समर्पित कर दिया। उन्होंने इस लक्ष्य को प्राप्त करने करने के लिए अपनी स्वयं की गल्तियों और खुद पर प्रयोग करते हुए सीखने की कोशिश की। उन्होंने अपनी आत्मकथा को सत्य के प्रयोग का नाम दिया।

गांधी जी ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ने के लिए अपने दुष्टात्माओं , भय और असुरक्षा जैसे तत्वों पर विजय पाना है। गांधी जी ने अपने विचारों को सबसे पहले उस समय संक्षेप में व्य‍क्त किया जब उन्होंने कहा भगवान ही सत्य है बाद में उन्होने अपने इस कथन को सत्य ही भगवान है में बदल दिया। इस प्रकार , सत्य में गांधी के दर्शन है " परमेश्वर  " 

हालांकि गांधी जी अहिंसा के सिद्धांत के प्रवर्तक बिल्कुल नहीं थे फिर भी इसे बड़े पैमाने पर राजनैतिक क्षेत्र में इस्तेमाल करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। अहिंसा (nonviolence), अहिंसा (ahimsa) और अप्रतिकार (nonresistance)का भारतीय धार्मिक विचारों में एक लंबा इतिहास है और इसके हिंदु, बौद्ध, जैन, यहूदी और ईसाई समुदायों में बहुत सी अवधारणाएं हैं। 
गांधी जी ने अपनी आत्मकथा द स्टोरी ऑफ़ माय एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ " (The Story of My Experiments with Truth)में दर्शन और अपने जीवन के मार्ग का वर्णन किया है। 

जब मैं निराश होता हूं तब मैं याद करता हूं कि हालांकि इतिहास सत्य का मार्ग होता है किंतु प्रेम इसे सदैव जीत लेता है। यहां अत्याचारी और हत्यारे भी हुए हैं और कुछ समय के लिए वे अपराजय लगते थे किंतु अंत में उनका पतन ही होता है -इसका सदैव विचार करें।

" मृतकों, अनाथ तथा बेघरों के लिए इससे क्या फर्क पड़ता है कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र के पवित्र नाम के नीचे संपूर्णवाद का 
पागल विनाश छिपा है।

एक आंख के लिए दूसरी आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी।

मरने के लिए मेरे पास बहुत से कारण है किंतु मेरे पास किसी को मारने का कोई भी कारण नहीं है।

इन सिद्धातों को लागू करने में गांधी जी ने इन्हें दुनिया को दिखाने के लिए सर्वाधिक तार्किक सीमा पर ले जाने से भी मुंह नहीं मोड़ा जहां सरकार, पुलिस और सेनाए भी अहिंसात्मक बन गईं थीं। विज्ञान का युद्ध किसी व्यक्ति को तानाशाही , शुद्ध और सरलता की ओर ले जाता है। अहिंसा का विज्ञान अकेले ही किसी व्यक्ति को शुद्ध लोकतंत्र के मार्ग की ओर ले जा सकता है।प्रेम पर आधारित शक्ति सजा के डर से उत्पन्न शक्ति से हजार गुणा अधिक और स्थायी होती है। यह कहना निन्दा करने जैसा होगा कि कि अहिंसा का अभ्यास केवल व्यक्तिगत तौर पर किया जा सकता है और व्यक्तिवादिता वाले देश इसका कभी भी अभ्यास नहीं कर सकते हैं। शुद्ध अराजकता का निकटतम दृष्टिकोण अहिंसा पर आधारित लोकतंत्र होगा;;;;;;संपूर्ण अहिंसा के आधार पर संगठित और चलने वाला कोई समाज शुद्ध अराजकता वाला समाज होगा।

गांधी ने कभी भी मुश्किल परिस्थितियों में भी अपने इन सिद्धांतों को नहीं त्यागा बल्कि आजीवन  वही करते रहे जिसे उनकी अंतरात्मा ने सही ठहराया। इस मजबूत व्यक्तित्व वाले इन्सान का नाम मजबूरी के साथ जोड़ना उनका अपमान ही है।बापू को मजबूरी से नहीं मजबूती से ही जोड़ कर रखें। 

"मजबूती का नाम महात्मा गांधी"

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