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मैला नहीं किताब उठाओ

डॉ राजेंद्र यादव आजाद 02 Sep 2026 कविताएँ अन्य कविता 37 0 Hindi :: हिंदी

मैला नहीं, किताब उठाओ
दलित के घर पैदा होना
कोई गुनाह नहीं है,
गुनाह तो तब है
जब सदियों से थोपा गया काम
अपनी किस्मत मान लो।
कब तक उठाते रहोगे मैला
अपने पुरखों की तरह?
कब तक दूसरों की गंदगी को
अपने माथे का भाग्य समझोगे?
अब हाथों में टोकरी नहीं,
किताब होनी चाहिए,
आँखों में मजबूरी नहीं,
भविष्य का सपना होना चाहिए।
मंदिर की घंटी की तरफ
भागने से पहले
सुबह स्कूल की घंटी सुनो,
उसकी आवाज में
अपने भविष्य की पुकार सुनो।
जिस हाथ को समाज ने
मैला उठाने के लिए मजबूर किया,
उसी हाथ में कलम पकड़ो,
उसी हाथ से
अपनी तकदीर लिखो।
तुम्हारे पुरखों ने
बहुत कुछ सहा है,
अपमान की आग में जले हैं,
लेकिन तुम उनकी मजबूरी को
अपना भविष्य मत बनाओ।
उनकी पीड़ा को याद रखो,
मगर पीड़ा की परंपरा मत ढोओ,
उनके संघर्ष से शक्ति लो
और शिक्षा की राह पर चलो।
किताब उठाओ,
ज्ञान उठाओ,
आत्मसम्मान उठाओ,
और उस सोच को पीछे छोड़ दो
जो कहती है—
“जन्म ही तुम्हारा काम तय करता है।”
नहीं!
जन्म तुम्हारी शुरुआत है,
तुम्हारी मंजिल नहीं।
जाति तुम्हारे ऊपर थोपी जा सकती है,
लेकिन तुम्हारी प्रतिभा पर
किसी का अधिकार नहीं।
तुम डॉक्टर बन सकते हो,
इंजीनियर बन सकते हो,
अधिकारी बन सकते हो,
शिक्षक बन सकते हो,
लेखक बन सकते हो—
तुम वह सब बन सकते हो
जिसका सपना तुम्हारी आँखें देखती हैं।
बस अब
मैला उठाने वाले हाथों को
कलम का साथी बनाओ,
झुकी हुई पीठ को सीधा करो,
और अपने बच्चों को
वही विरासत मत देना
जो तुम्हें मजबूरी में मिली थी।
मैला नहीं, किताब उठाओ,
मजबूरी नहीं, शिक्षा चुनो।
दूसरों की गंदगी नहीं,
अपने सपनों का बोझ उठाओ।
मंदिर की घंटी बाद में,
पहले स्कूल की घंटी सुनो—
क्योंकि वही घंटी
तुम्हारे भविष्य को पुकार रही है।
और जिस दिन
तुम्हारे हाथ में कलम होगी,
तुम्हारी पहचान
तुम्हारी जाति से नहीं,
तुम्हारी काबिलियत से होगी।
उस दिन अपने पुरखों से कहना—
“आपने मजबूरी में जो उठाया था,
मैंने उसी हाथ से
अपना भविष्य उठा लिया है।”
मैला नहीं—
किताब उठाओ।
सिर झुकाकर नहीं,
सिर उठाकर जियो। जोहार अहीर डॉ राजेंद्र यादव आजाद मोबाइल 94 1427 1288

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