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मेरी अधूरी कहानी भाग -2

ajay kumar suraj 30 Mar 2023 आलेख प्यार-महोब्बत प्यार मे धोखे pyaar me dhokhe 73546 0 Hindi :: हिंदी

मेरी अधूरी कहानी भाग -2 

कांटे से जब दामन उलझ ही गया,तो मधुर प्यार का फूल खिल जायेगा।
प्रेम लेकर मरुस्थल मे भटके कोई तो,बहारो का संसार मिल जायेगा।। 
        एक पवित्र प्रेम कि ज्योति मन मे जगाये मुझे इंतज़ार था,उस प्रेमिका कि जिसके स्वप्नो कि दुनिया मे मै तरुणाई कि आगोश मे सो जाया करता था।यही विचार रहता जब भी उससे मिलुंगा,सदियो के इंतज़ार मे जो भी बाते कहनी है उससे बेबाक बोलुंगा ।
                                                 जब उससे पहली बार मिला था तो कुछ भी कहने कि हिम्म्त न हुई थी जो भी बात हुई पहले उसी ने शुरू की मुझे वह पसन्द आने लगी थी।कभी शौक शृंगार की आदत न रखने वाले  मेरे हृदय मे पता नही क्यो अब सुन्दर दिखने कि ललक जग उठी थी। अब तो हर दिन उसका आना और दो पल के लिये ही उसे निहार लेना मेरे लिये किसी लम्बी कतार मे बडी कठिनाई से मिले प्रभु दर्शन पाकर जो त्रिप्ति मिलती वह खुशी महशूस होने लगी थी।गर कभी उससे बात हो जाती तो मालूम होता कि किसी साध संगत के समागम मे हरि चर्चा का आनन्द सा मिला हो।
      जैसे हर तरन्नुम से मिलि है तेरि आवाज मुझे। इक ही नगमा सुनाता है अब हर साज मुझे।।
कोई भेद रह ही नही गया जिस तरह किसी ब्रम्ह्ग्यानी को ब्रम्ह का दर्शन हो जाये तो वह समस्त चराचर जगत मे अपने राम को पाता है। उसी तरह वह मुझे हर शै मे नज़र आ रही थी।

                                                 क्योकि प्रेम के यही लक्षण पनप रहे थे ---- प्रेम वासना नही प्रेम उपासना है,प्रेम साधन नही प्रेम साधना है। प्रेम को जान जायेगा तो परमात्मा मान जायेगा। और जब परमात्मा को जान गया तो उसे अपना बनाते देर नही लगती। प्रेम का दीपक यदि प्राणो मे प्रकाशित हो आत्मा का आंगन ही पवित्र बन जाता है । प्रेम कभी किसी से कुछ नही मांगता,प्रेम तो खुद ही समर्पण का नाम है। प्रेम मे न कोइ ईक्षा बचती है न ही जिग्यासा । जहाँ चाह समाप्त होती है वही प्रेम जन्म ले लेता है।
             प्रेम क्या है? ----

                        प्रेम का प्रदीप गर प्राणो मे प्रकाशित हो,तो आत्मा का आँगन पवित्र हो जायेगा।

                        और ढाई अक्षर का पाठ पढ लिया,तो मानचित्र मन क विचित्र बन जायेगा ॥

                        फिर कैसी हार कैसी जीत कौन शत्रु कौन मीत,सारा जग अपना ही चित्र बन जायेगा।

                        और इस चित्र को रख लिया सम्हाल कर,तो सच मानो अपना चरित्र बन जायेगा॥

चरित्र बनाने कि विधा है प्रेम, यदि प्रेम मे चरित्र खो गया तो वह प्रेम नही बस वासना की पूर्ति का एक साधन मात्र बन कर रह जायेगा। और जहाँ बात साधन कि हो तो प्रेम वहाँ समाप्त हो जायेगा।
  किसी कवि ने कहा---  इश्क, एक तरफा मे, यू मसरूर हो जाउंगा मै।

                               राम,तुम होंगे शमा ,काफूर हो जाउंगा मै।
                               मै तुम्हे देखू तो देखू,तुम न मुझको देखना॥

                               तूने गर देखा मुझे ,मशहूर हो जाउंगा मै।

                               मै तुम्हे चाहूँ तो चाहूँ, तुम न मुझको चाहना।

                               तूने गर चाहा मुझे,मगरूर हो जाउंगा मै॥

                               मै अगर मांगू कभी ,कुछ न देना तुम मुझे।

                               वरना फिर प्रेमी नही, मज़दूर  हो जाउंगा मै।

हर लम्हा हर घड़ी उसका इंतज़ार रहता था।एक दिन अकस्मात वह आ ही गयी ऐसा लगा मानो खुदा ने फरियाद सुन ली हो और अपने दुआओ मे मुझे प्रेम का नज़राना दिया हो। उसे देख कर मेरा रोम रोम पुलकित हो उठा मानो सदियो कि प्यास बुझ गई हो। मुझे ऐसा अन्दाज़ा लगा जैसे अर्जुन ने भगवान नारायण के विराट रूप का दर्शन कर लिया हो। वह कुछ न बोली बस मुझे कुछ पल निहारती हुई बोली अपना नम्बर हमे दे दीजिये,और चुपचाप चली गई उसी रात उसका फोन आया। उसने कहा "मुझे आपसे बात करनी है मै आपको पसन्द करती हूँ " मै आवाक था क्योकी न ही मुझे आशा थी न ही विश्वास फिर यह सिल-सिला दो चार दिन चलता रहा ।अचानक उसी रात बात के दौरान उसकी भावनात्मक बातो मे वासना घर करने लगी बातो का सिल सिला अब सुन्दर भावनाओ मे न होकर अश्लीलता की दहलीज को लांघ रही थी।मेरा दिल मान नही रहा था और दिमाग दिल से प्रतिद्वन्द कर बैठा। क्या यही प्यार के लक्षण है? अभी चार दिन भी न हुये हम एक दूसरे को भली भांति जानते भी नही फिर ऐसी बाते क्यो?
    रामचरित मानस से बात याद आयी------

                  सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।।

                  भ्राता पिता पुत्र उरगारी।पुरुष मनोहर निरखत नारी॥
                 होहि बिकल सक मनहि न रोकी।जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥

                 रुचिर रूप धरि प्रभु पहि जाई।बोली बचन बहुत मुस्काई ॥

                मम अनुरूप पुरुष जग माही। देखेउँ खोज लोक तिहु नाही॥

                ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥
सूपर्णखा रावण कि बहन थी,जो नागिन के समान दुष्ट हृदय वाली औरत थी। जैसे भूख लगने पर सर्पणी अपने बच्चे को ही अपना आहार बना लेती है ।उसी प्रकार कोई कामुक स्त्री जब वसना के वशीभूत होती है तो,वह भाई ,पिता,पुत्र, सगे सम्बन्धी चाहे जो हो उससे अपने हवस (वासना) की पूर्ति करती है। वासना से वशीभूत स्त्री सुन्दर साजोसज्जा करके किसी भी पुरुष के पास जाकर बोलती है आज तक मेरा सम्बन्ध किसी से नही रहा मेरा दिल किसी पर नही आया पता नही कैसे तुम पर आ गया।
                                       इस चौपाइ मे वर्णित व्याख्यान अक्षरश: उससे सुनने को मिला था। कि कालेज मे मेरे गांव मे आज तक बहुत से लडके मेरे पीछे पड़े मुझे चाहने वाले रहे। पता नही कैसे आप मुझे पसन्द आ गये ।
पसन्द आना और प्रेम अलग बात है कुछ भी हो ये वासना कहाँ से आई प्यार के बीच मे वो भी हद पार कर जिसका वर्णन किया भी न जा सके। उस माता- पिता के विश्वास का क्या होगा जो तुम्हे बडे गर्व और विश्वास के साथ महविद्यालय मे पढ्ने भेजते है।उनके साथ तो छलावा हुआ,जिस भाई कि कलाई पर राखी बाधती हो और वह तुम्हे वचन देता है तुम्हारे गौरव और आत्मसम्मान कि रक्षा के लिये। और उससे छिपकर उसके विश्वास और प्रेम को तोडने का कार्य। कहाँ रह गई प्रेम की बात कहाँ रह गयी मर्यादा जब वासना ने घेर कर तुम्हारे आन्दर घर कर लिया तो वह प्रेम स्वत:समाप्त हो गया।   
                और उनकी अश्लील बातो का प्रतिकार करने पर उनकी दिलचस्पी और प्यार मेरे लिये न के बराबर हो गया।अब न उनका फोन आता है न वो। कभी-कभी जब सामने से गुजरती है तो बस मुझसे नज़र बचा के जाती है। मेरा प्रेम जो बुलन्द इमारत की तरह ख्वाब सजाये खडा था।खन्डहर मे तब्दील हो चुका था।



   

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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