SEWANAND 15 Aug 2023 आलेख समाजिक वाणी पर अंकुश लगाइए 39479 1 5 Hindi :: हिंदी
वाणी पर अंकुश लगाइए' वाणी मनुष्य जाति का वह वरदान है जिसके माध्यम से वह अपने को, अपने विचारों एवं भावों को व्यक्त करने में समर्थ होता है। वाणी मनुष्य का मौलिक अधिकार है केवल बोलना ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रतापूर्वक बोलना मानव का मौलिक अधिकार है। वाणी की स्वतन्त्रता को समस्त देशों में संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। परन्तु आजकल है देखते हैं कि वाणी की स्वतंत्रता को उसने वाणी की उच्छृंखलता की सीमा तक पहुँचा दिया। है। शास्त्र का कथन है कि सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय बात सत्य होने पर भी मत बोलो। तात्पर्य यह है कि प्रिय कथन वाणी की सार्थकता है। प्रिय वाणी सब सुनना चाहते हैं। प्रकृति भी चाहती है कि हम वाणी का प्रयोग प्रिय कथन हेतु करें - कागा काको धन हरै, कोयल काको देइ । मीठे वचन सुनाई कै, जग अपनो कर लेइ । । अप्रिय वाणी वस्तुतः हमारे मन के मैल को ही प्रकट करती है। हम वही तो व्यक्त करते हैं जो हमारे मन में है। वाणी की पवित्रता हमें मन को पवित्र बनाने की शिक्षा देती है। कहा भी जाता है वाणी मन का चित्र है। वाणी का संयम मानव का एक महत्वपूर्ण मौलिक मूल्य है। वाणी की सत्यता एवं प्रियता हमें मौलिक रूप से प्राप्त हुई हैं क्योंकि वह आत्मतत्व के मौलिक अंश रूप में हमारे अन्तःकरण में निवास करता है। वाणी के दुरूपयोग द्वारा हम अपने | आत्मतत्व की हानि करते हैं। प्रकृति ने हमको बोलने के लिए केवल एक जीभ दी है और सुनने के लिए दो कान दिए हैं, साथ ही जीभ दो क्रियाएँ सम्पन्न करती है बोलना और स्वाद लेना । कान केवल एक काम करता है सुनना। अतः गणित के नियमानुसार - हम जितना सुने, उसका एक चौथाई बोलें। कम बोलना प्रकृति के साथ सहयोग करना माना जाता है। अंग्रेजी के विश्वविख्यात नाटककार विलियम शेक्सपियर ने लिखा है कि "मितभाषी मनुष्य सर्वश्रेष्ठ मनुष्य होते हैं, जो व्यक्ति बिना विचारे बोलते चले जाते हैं उनकी तुलना बिना समझे-बूझे दवाओं का इस्तेमाल करने वाले नीम हकीम से की जाती है।" फ्रांसीसी भाषा में एक प्रसिद्ध कहावत है "एक बुद्धिमान व्यक्ति भाषण करने के पहले चिन्तन करता है, एक मूर्ख भाषण करने के उपरान्त चिन्तन करता है कि उसने क्या कह दिया।" इस संदर्भ में लैटिन भाषा की यह कहावत अप्रासंगिक नहीं होगी। एक समय ऐसा होता है जब कुछ भी नहीं कहा जाना चाहिए, एक समय ऐसा होता है जब कुछ कहा जाए, परन्तु ऐसा कोई भी समय नहीं होता है जब कुछ कह दिया जाए। जीवन में ऐसे अवसर तो आते हैं जब कुछ कहा जाए, परन्तु ऐसा अवसर कभी नहीं आता। जब सब कुछ कह दिया जाए। व्यक्ति वाणी पर जितना अधिक संयम रखता है वह उतना ही श्रेष्ठ एवं प्रभावशाली वार्ताकार बन जाता है। लेखक :- सेवानंद चौहान राज्य पुरस्कार प्राप्त शिक्षक