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Onkar Verma

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@ onkar-verma
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मेरे शब्द मेरी पहचान

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My Articles

मन भरने लगा है नाजाने क्यो जीने से डर लगने लगा है........ अपने हों या बेगाने सब के अलग - अलग हैं पैमाने किस - किस का माप समझूं मैं अनाड़ी जब हर � read more >>
क्यों नाराज़ रहते हो क्यों नहीं कुछ कहते हो..... हमें भी दर्द देते क्यों खुद भी दर्द सहते हो....... तुम्हें क्या पता जब महीनों तुमसे बात नही read more >>
कोई ऐसी भी दवाई बना दे कोई ऐसी भी दवाई बना दे कोई ऐसी ख़ुराक खिला दे खाते ही कुछ भी याद न रहे अच्छी हों या बुरी बस बीती सारी यादें भुला दे read more >>
बचपन की दौड़ बचपन से ही एक दौड़ लगी थी जिंदगी को बचाने की कुछ पाने की कुछ आजमाने की होड़ लगी थी…… कुछ सपने पाले थे कुछ अलग करने की कुछ अ� read more >>
जीवन का सच जिंदगी में हर पल खूबसूरत नहीं होता, बनाना पड़ता है यहाँ कड़वी दवाई भी पीनी पड़ती है यहां मीठे ज़हर को भी आजमाना पड़ता है …………… � read more >>
शब्दों की कीमत आज फिर लिखने का मन है आज फिर बिकने का मन है फिर सोचता हूं……. क्यों लिखूं ? क्यों बिकूं ? कोई खरीदने को तैयार नहीं मेरे श read more >>
यादें - बचपन की यादों के उन उधड़े चिथड़ों को आज भी फिर से जीना चाहता हूं आज फिर से उस बचपन को जीना चाहता हूं...... कितना आनंदित था मैं न सोने read more >>
मेरी सच की दुकान कभी मैंने भी एक दुकान लगाई थी बड़ी शिद्दत से सजाई थी….. कुछ ख़्वाब रखे थे कुछ ख्याल रखे थे कुछ सपनों के कोने थे कुछ खुशि read more >>
कुछ सवाल - कुछ जवाब न कोई कलम, न कोई किताब, रखता हूं पल भर की जिंदगी है यह सोच न कुछ लेने का, न कुछ देने का, हिसाब रखता हूं........ न अलीशान महलो� read more >>
मजदूर हूं पर मजबूर नहीं मजदूर हूँ पर मजबूर नहीं पत्थर तोड़ता हूँ पर दिलों को जोड़ता हूँ जाड़े की ठण्ड में ठिठुरता हूँ तपती धूप में झु� read more >>
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