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यादें बचपन की-आज भी फिर से जीना चाहता हूं

Onkar Verma 29 Jan 2024 कविताएँ समाजिक बचपन की कुछ सुनहरी यादें 27896 0 Hindi :: हिंदी

यादें  - बचपन की

यादों के उन उधड़े चिथड़ों को
आज भी फिर से जीना चाहता हूं	
आज फिर से उस बचपन को जीना चाहता हूं......
कितना आनंदित था मैं
न सोने की चिंता
न जागने का समय
न कुछ पाने की चाहत
न खो जाने से आहत………...
वो प्यारा सा बचपन
वो अनोखा सा अल्हड़पन
याद है वो गलियों में दौड़ना
चीखना और चिल्लाना
याद है वो बार - - नाबार माँ का बुला
आया, कहकर भी ना आना
कंचो का वो खेल 
गिल्ली डंडे का वो मेल……
अंधेरा होने पर माँ का वो खींच कर ले जाना
बाबा से शिकायत करने का झूठा डर दिखाना
बाबा के डांटने पर अपने आँचल में छुपाना
याद है माँ का वो देर रात तक जागना
दीये की धुंधली रौशनी में सूत कातना
याद है वो आज भी……………………….
माँ की गोद में सिर रख कर चरखे के पहिये को ताकना………………………..
कभी लम्बी खिंचती सूत की डोर को काटना
याद है वो प्यार से फिर माँ का डांटना 
पता नहीं यूँ ही धागे को बुनते -बुनते 
चरखे की तान को सुनते – सुनते
कब माँ की गोद में  सो जाता था
सुबह खुद को बिस्तर पर पाता था
यादों के उन उधड़े चिथड़ों को
आज भी फिर से सीना चाहता हूं
आज फिर से उस बचपन को जीना चाहता हूं...................
याद है वो सुबह होते ही  वो खेत को जाना
बैलों संग खेत में हल चलाना
एक हाथ से हल को जकड़े रखना
दूसरे हाथ से बाबा का हाथ पकड़े रखना
बैलों को हाँकना
तोतली आवाज़ में उनको डांटना
याद है वो मक्की के दाने का
मिट्टी में समाँ जाना
याद है वो माँ का खेतों में खाना लाना
याद है मिट्टी से सने हाथों से खाना, खाना
आज फिर उन्हीं हाथों से पानी पीना चाहता हूं 
आज फिर से उस बचपन को जीना चाहता हूं..................................
यादों के उन उधड़े चिथड़ों को
आज भी फिर से सीना चाहता हूं	
आज फिर से उस बचपन को जीना चाहता हूं.......

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