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ग़ज़ल
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ग़ज़ल
मेरी तो निगाहें हैं सूरज के ठिकानों तक
तुम सोच रहे हो बस, बादल की उड़ानों तक मेरी तो निगाहें हैं, सूरज के ठिकानों तक टूटे हुए ख़्वाबों की इक लम्बी कहानी है शीशे की हवेली से, पत्�
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जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से
जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन न बि�
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अंधेरा पूरा नहीं पूरी रौशनी भी नहीं
हमारे चेहरे पे ग़म भी नहीं, ख़ुशी भी नहीं अंधेरा पूरा नहीं, पूरी रौशनी भी नहीं है दुश्मनों से कोई ख़ास दुश्मनी भी नहीं जो दोस्त अपने हैं उ
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कौन आया है हथेली पे' सितारे लेकर
झिलमिलाते हुए दिन रात हमारे लेकर कौन आया है हथेली पे' सितारे लेकर हम उसे आँखों की देहरी नहीं चढ़ने देते नींद आती न अगर ख़्वाब तुम्हारे �
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सूरज-ढल गया दे के रोशनी सूरज
ढल गया दे के रोशनी सूरज कह गया बात इक नई सूरज एक्टिंग डूबने की करता है डूबता तो नहीं कभी सूरज शाम होते ही छोड़ जाता है रोज़ ऑंखों में कु�
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हम क्या जानें धर्म की बातें-हम हैं राही प्रेमडगर
इन ढालों के दुर्गम पथ पर देखे रोज़ फिसलते लोग फिर कैसे शिखरों पर पहुँचे बैसाखी पर चलते लोग प्यारी नदियों की आहों पर हृदय तुम्हारा पि�
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हम क्या जानें धर्म की बातें-हम हैं राही प्रेमडगर
इन ढालों के दुर्गम पथ पर देखे रोज़ फिसलते लोग फिर कैसे शिखरों पर पहुँचे बैसाखी पर चलते लोग प्यारी नदियों की आहों पर हृदय तुम्हारा पि�
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हम क्या जानें धर्म की बातें-हम हैं राही प्रेमडगर
इन ढालों के दुर्गम पथ पर देखे रोज़ फिसलते लोग फिर कैसे शिखरों पर पहुँचे बैसाखी पर चलते लोग प्यारी नदियों की आहों पर हृदय तुम्हारा पि�
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हम क्या जानें धर्म की बातें-हम हैं राही प्रेमडगर
इन ढालों के दुर्गम पथ पर देखे रोज़ फिसलते लोग फिर कैसे शिखरों पर पहुँचे बैसाखी पर चलते लोग प्यारी नदियों की आहों पर हृदय तुम्हारा पि�
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मुक़द्दर अपना-अपना है-ये हिन्दुस्तान सबका है
न मेरा है न तेरा है ये हिन्दुस्तान सबका है नहीं समझी गई ये बात तो नुक़सान सबका है हज़ारों रास्ते खोजे गए उस तक पहुँचने के मगर पहुँचे हु�
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एक अंधे दौर के सिर पर चढ़े हैं
आप कहने को बहुत ज़्यादा बड़े हैं असलियत यह है मचानों पर खड़े हैं ख़ास कंधा, दास चंदा, रास धंधा, एक अंधे दौर के सिर पर चढ़े हैं कीजिए झट कीजिए
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ज़िन्दगी-ज़िन्दगी की घड़ी टली भी नहीं
ज़िन्दगी-सी यों ज़िन्दगी भी नहीं किन्तु मंजूर ख़ुदक़ुशी भी नहीं सिलसिलेवार मौत जीते हैं ज़िन्दगी की घड़ी टली भी नहीं दिल की दुनिया उजाड़ �
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