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कविताएँ
असावी सात एका भावाची-बहिणीची रात एक विसाव्याची
असावी सात एका भावाची , बहिणीची रात एक विसाव्याची. असावी जान बहीण असते आई जणू भावाची, भावाची सात देणार सावली तो बापाची. कवी - समीर लांडे
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हरवल काही-जे मिळत नाही
हरवल काही जे मिळत नाही, स्वप्नांची वाट दिसत नाही. होय बरं चाललंय पण खर काय, दुसऱ्यांच्या वाटेवर जणू नग्न पाय . आपल कुणी दिसत नाही, हरवल
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नसेल येत तर शिकून-नाहीतर शिकवून घ्यावीत
डोळ्यातील पाण्याचं काय ते तर केव्हा ही येत , कधी रडताना तर कधी हस्ताना ही येत. मानस जपता आली तर जपून घ्यावीत, नसेल येत तर शिकून, नाहीतर �
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प्रत्येक रातीला तुझ्या-आठवणींची लाट येते
प्रत्येक रातीला तुझ्या , आठवणींची लाट येते. वहीच्या पानावर तुझ्याच , चेहऱ्याची छाप येते. स्पर्श त्या छापेचा , मला गगनात नेतो. तू नसता�
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छात्रावस्था-कुछ बरस तक कुछ समय तक हम साथ थे
कुछ बरस तक कुछ समय तक हम साथ थे । बटँ गये राह क्योंकि सबके मंजिल अलग - अलग थे। जो आसपास के थे
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अपनापन-जो छोड़ गये तुम को तुम क्यो उनको अपना कहते हो
आत्मीयता खोकर भी तुम अपना कहते हो । जो छोड़ गये तुम को तुम क्यो उनको अपना कहते हो । जिन्हें प्रेम नहीं ह�
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बाँट-जो एक जीवन भर अन्त समय में में बाँटा
पले बढ़े जिनके आगे जिनकी गोदी मे खेले क्या वस्तु है वे कोई जो उनको बाँटा जाता है। खण्ड - खण्ड हो जाता उर , जब द�
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मच्छर महाराज-इन मच्छर महाराज का करो जल्द संहार
*मच्छर महाराज* *हास्य व्यंग कविता* *रचयिता ---अखिलेश श्रीवास्तव एडवोकेट जबलपुर* कीटों के सरताज तुम हे मच्छर महाराज अपने अंदर छुपा र�
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गांव-वो दौर वापिस ले आओ उस गांवों मुझे घुमाओ
आज सुबह हुआ करता है। कलः भोर हुआ करता था। नाना-नानी के गांवों में एक छोर हुआ करता था। जीवन कटते-कटते चल रहा, मन अटके-अटके कह रहा। मन की स
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भव्य राम मंदिर-सनातन धर्म की धरती वह अयोध्या नगरी
सनातन धर्म की धरती, वह अयोध्या नगरी, भव्य राम मंदिर, प्रेम और भक्ति का धाम। रामलला के लिए बनी, जिसने लोगों को जोड़ा, अयोध्या का राम मंद�
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पूर्ण सत्य के पथ पर-जुर्म के खिलाफ उठ जाते है कई शख्श
जब भी बोलता हूँ मैं जुर्म के खिलाफ , उठ जाते है कई शख्श मेरे खिलाफ । देख रहे है जन अधरो पर हाथ धरे , मौन सभी बैठे है हाथो पर हाथ धरे
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दर्द भरी जिंदगी-दुख के वक्त ही अपनो की पहचान
दर्द भरी जिंदगी हमें सिखा जाती है दुख के वक्त ही अपनो की पहचान होती है जो वक्त में साथ दे वही अपना कहलाती है अच्छे अच्छे को वक्त रोला �
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