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कविताएँ
क्या हो गया आज लोगों को-बात बात में लड़ जाते हैं
(मुक्तक छंद) क्या हो गया आज लोगों को बात _बात में लड़ जाते हैं। ईर्ष्या की आग में जलकर लोग स्वयं भस्म हो जाते हैं। खुद मत जलें भाइयों इस
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हम बेटी है कोई सामान नहीं है-जितना सोचते हो उतना आसान नहीं है
जितना सोचते हो उतना आसान नहीं है हम बेटी है कोई सामान नहीं है जब चाहें जैसे उपयोग में लाओ तुम रौब अपना हम पे दिखाओ तुम इतने गुमनाम नही�
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दोस्तों कि डोर दबाते रहिये-पुराने साथियों को सताते रहिये
दोस्तों कि डोर दबाते रहिये, पुराने साथियों को सताते रहिये। प्रेम और क्रोध को जताते रहिये, कभी हाले दिल बताते रहिये। कभी अपनी खबर सु�
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दिन बीतने को है- और अभी तक सोचा तक नहीं
दिन बीतने को है और अभी तक सोचा तक नहीं यह रिश्ते जो जकड़े हुए हैं अपनों से अकड़े हुए हैं इन आंसुओं को लोगों में बांट दूं या बारिश की बू�
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धीमा जहर बनकर तुम मेरी जिंदगी में आए-खुशियों से भरा था जीवन
खुशियों से भरा था जीवन उड़ रही थी मैं पंख फैलाए नैनो में भरी थी आशा तन से युवान खुशबू आए फिर धीमा जहर बन कर तुम मेरी जिंदगी में आए आशाओ�
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मात पिता पर कविता-माँ की ममता पिता का स्नेह
माँ की ममता, पिता का स्नेह, जीवन के साथी, बिना उनके अधूरा रहे नहीं। बचपन के सपने, माँ-पापा के आशीर्वाद, जीवन की दौड़ में, हमेशा समर्पित र
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मुक्तक-दूरी की ही बात अगर है दूर आज उल्लास बहुत है
दूरी की ही बात अगर है दूर आज उल्लास बहुत है क्षण क्षण में यह विपदा आई मानो कही सिन्धु बह आई । तुम्हें देखने से पहले मस्तक पर कुछ छप जात
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मानो बस इंसान हो-किस बात से हैरान हो
किस बात से हैरान हो मानो बस इंसान हो। कर्तव्य से परे ना हो धर्म का अभिमान हो। किस बात से हैरान हो मानो बस इंसान हो। जो तुम्हारे हाथ �
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आया पावस का दिन-मेघ की काली घटा में देखने
मेघ की काली घटा में देखने दो गौर से भाव विह्वल हो गए तरु बरसात की एक बूंद से। प्रकृति का यह रंग देखो बरसने का ढंग देखो चारों तरफ पानी �
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मैं एक कवयित्री हूं-शब्दों की उधेड़बुन करके
मैं एक कवयित्री हूं शब्दों की उधेड़बुन करके करती अपने विचारों की अभिव्यक्ति हूं हां मैं एक कवित्री हूं ठहराव था कभी जिस कलम में उस �
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इंसान-ना जाने इंसान कितने किरदार निभाते हैं
ना जाने इंसान कितने किरदार निभाते हैं वफा का बात कर , पीछे से वार करते हैं ..!! ना जाने इंसान कितने किरदार निभाते हैं ..!!! चेहरे एक , रंग उस
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भारत-विविध रूप होते जहां पर विविध जहां की भाषा
विविध रूप होते जहां पर, विविध जहां की भाषा। विविध विविध हैं भेष उनके, विविध वहां के वासा। चट्टान से मजबूत हैं नर, पीछे नहीं नार�
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