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कविताएँ
रब ने क्या खूब बनाया है-इस सृष्टि को
रब ने क्या खूब बनाया है इस सृष्टि को सुबह नित्य जल्दी सब उठते हैं अपने काम को हो रवाना सब ढलते चलते हैं जीने मरने का खेल ये जो खूब रच�
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नित संकट है सामने-डोल रहा ईमान धरती के भगवान तो
(दोहा छंद) नित संकट है सामने,डोल रहा ईमान। धरती के भगवान तो,बना रहा सुनसान।। धरती के भगवान को,मरना पड़ता यार। वहम नहीं पालें यहां,रखि�
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धरती के भगवान हैं- माने तो सब जीव सबका ही अधिकार है
(दोहा छंद) धरती के भगवान हैं, माने तो सब जीव। सबका ही अधिकार है, सब हैं खास अतीव।। धरती के भगवान तो,बना रहा सुनसान। नित संकट है सामने, डो�
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धरती के भगवान से- परहेज ज्यादा रखें लगाव तो
(दोहा छंद) धरती के भगवान से,रखिए सब परहेज। ज्यादा रखें लगाव तो, कर देगा निस्तेज।। धरती के भगवान तो,धरती मातु विशाल। राजा रंक समाय सब, इ
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चिन्ता सोते जागते-फिर भी हो बदनाम पहले जैसे अब कहां
(दोहा छंद) चिन्ता सोते जागते, फिर भी हो बदनाम। पहले जैसे अब कहां,चैन रैन आराम।। पहले जैसे अब कहां,पानी हवा जुगार। मिले मिलावट में सभी,�
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छलते कोई भी यहां-बनते फिरते बाज पहले जैसे अब कहां
(दोहा छंद) छलते कोई भी यहां, बनते फिरते बाज। पहले जैसे अब कहां,छलियों का है राज।। पहले जैसे अब कहां,चैन रैन आराम। चिन्ता सोते जागते,फि�
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पहले जैसे अब कहां- प्यारे प्यारे लोग लगे हुए सब होड़ में
(दोहा छंद) पहले जैसे अब कहां, प्यारे प्यारे लोग। लगे हुए सब होड़ में,और बढ़े नव रोग।। पहले जैसे अब कहां, उमस भड़ी है बात। चक्कर काटे खूब
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मिलावट का आज जमाना है-हर कुछ में मिलावट है
(मुक्तक छंद) मिलावट का आज जमाना है हर कुछ में मिलावट है। फिर भी गम नहीं है लोगों में जग में बहु सजावट है। जीने की इस तरीके को मेरा हृदय स
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घर से निकल आए- घर के लिए पैसे कमाने
(मुक्तक छंद) घर से निकल आए घर के लिए पैसे कमाने। कई रूप देखे कई सवाल यहां के जमाने। परिश्रम रंग लाया पाया मैंने यहां सबकुछ _ हरेक रत्नो�
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उदासियों को पनपने ही न दें-कर देगी मजा किरकिरा
(मुक्तक छंद) उदासियों को पनपने ही न दें कर देगी मजा किरकिरा। व्यस्त रहने से बना रहेगा तन में उर्जा का जखीरा। जीवन जंग है लड़ना पड़ता य�
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हम भारत के लोग-विभिन्नताओं में भी एक हैं
(मुक्तक छंद) हम भारत के लोग विभिन्नताओं में भी एक हैं। नेक हृदयवालों के लिए दिल से हम भी नेक हैं। भयानक मौत हूं दुश्मनों के लिए सभी हाल �
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भरे खजाना खूब ही-बड़ा करे आकार
(मुक्तक छंद) पहले जैसे अब कहां,पानी हवा जुगार। मिले मिलावट में सभी,छीने पर अधिकार। चौधरी बनकर तब चले,और दिखाए रोब_ भरे खजाना खूब ही,बड़�
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