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कविताएँ
आओ मन की घाटी में चलें
आज आओ, मन की घाटी में चलें। जो जहां रुक आए उससे फिर मिलें। साथ का साथी नहीं विश्वास से जो जागता जो उड़ानों की पहुंच से पार मुझको थामता�
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अकेलापन- अकेलेपन की वजह से हुई जीवन में मेरी हार
जब नहीं दिया किसी ने साथ, जब उम्मीद उमंग थी पास, अकेलेपन की वजह से हुई जीवन में मेरी हार। कोई किसी पर ना करें इतना बड़ा अत्याचार, किसी क�
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जलाओ न मेरे लिए तुम दीवाली-मेरे दुख के बादल छटेंगे
जलाओ न मेरे लिए तुम दिवाली, तुम्हारे लिए मैं जला न सकूँगा। बिछड़ जायेंगे हम अकेले - अकेले, न तुम साथ दोगे न मैं साथ दूँगा।। हृदय में मर�
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जलाओ न मेरे लिए तुम दीवाली-मेरे दुख के बादल छटेंगे
जलाओ न मेरे लिए तुम दिवाली, तुम्हारे लिए मैं जला न सकूँगा। बिछड़ जायेंगे हम अकेले - अकेले, न तुम साथ दोगे न मैं साथ दूँगा।। हृदय में मर�
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आजाद देश की नारी हो तुम- करना नहीं किसी की गुलामी
आजाद देश की नारी हो तुम करना नहीं किसी की गुलामी सहना नहीं जुर्म तुम मत भरना तुम किसी के हां मात्र में हामी तु धीर वीर गम्भीर है तेरी �
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स्वच्छता स्वस्थ रहने की एक चाभी है
स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत अपने देश की रक्षा हम स्वयं कर जायेंगे, चारो ओर प्रकृति को सुंदर हम बनायेंगे। करेंगे न कभी कूड़ा हम इधर उधर, ध�
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बारिश की बुंदे-पृथ्वी को सजा रहीं हैं
बारिश की बूँदे तपक रहीं हैं, पृथ्वी को सजा रहीं हैं। धरा पर सुहानी छाया छा रहीं हैं, फूलों को खुशबू दे रहीं हैं। बादल गर्ज रहे हैं ऊँच�
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सावन की फुहार-हर्षोल्लास भरती है
सावन की फुहार खुशबूवण लाती है, गर्मी की छुट्टी, हर्षोल्लास भरती है। बादलों की छांव में बचपन का खेल, खुशी-गम के संग जीने की मिसाल देती ह�
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प्रभु के जन को आशीष मिले
अतिशय कोविद् श्रेष्ठ प्रवर। चरणों में अर्पण इंदीवर।। करती मैं वंदन सतत् सतत्।। यशशील रहे एकल अविरत।। हो भाव विभाव प्रभाव सदा। क�
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अंधेरे के साथी-छोटी सी आशा और घना अंधेरा
छोटी सी आशा और घना अंधेरा सिर्फ मेरे साथ एक जुगनू लंबी रात के बाद सवेरा कब तक जला के रखूं रूई की मसाला को फिर छाएगा लंबा अंधेरा चलूं �
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मस्ती के साथी-कुछ दिन बीते है ऐसे जैसे कोई बात नहीं
कुछ दिन बीते है ऐसे जैसे कोई बात नहीं लोग मस्त है मस्ती में ,पूरी दुनिया की बात यही कुछ बातों का तर्क नहीं सौ बातो की बात यही
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तेरी कमीं खलती है- आज भी तेरी कमी तू आज भी है मेरे लिए बेटी नन्हीं
तेरी कमी खलती है आज भी तेरी कमी, तू आज भी है मेरे लिए बेटी नन्हीं। कैसे मैं समझूं? मानूं मैं बातें पराई पराई कहते हर कोई यही सोंच क�
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