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महा पूरूषोत्तम-शीव संकर
महा पूरूषोतम शीव संकर, दया दान के दाता है! पूरुषार्थ मर्यादा के पालक, शीव चरण मे शीश नवाता है!! जन्म - जन्म के दू:ख: हरता,
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नमो नमो शीव हरे हरे
राजा सगर दिग्गज रण विजयी, धरती पे ऋश्र बड़ाने को! कर रहे थे धरा पर महा यज्ञ, देव राज कहलाने को!! मानव कल्याण के सत्य धर्म,
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नमो नमो शीव हरे हरे 02
समर विशोनित सूर्यवंश, भगिरथ के वंश मे जन्म लिए, दशरथ नंदन श्री राम चन्द्र, रघू कूल के रीत के पालक थे!! रावण मृत्यू पश्चात राम को,
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रश्मी रथी बनु
समा बांध अविराम करे, आशाओं के चाहत पल पल! नयनो के गतीमय प्रगतीमान, उठती है दर्रख्तें कल कल कल!! अती अती अतिश्य चर्म कर्म,
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टिकाकरण अधिकार अपना
कर्म योग अती पावन निष्ठा, छल भी छलीत हो जाती है! बलवान कि हिम्मत भी आकर, अधरों मे दलीत हो जाती है!! पर्वत कहां झुकते है नदियों
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कर्म का अभिनंदन
धरा धरी वीरों कि गती से, है दृश्य चेतना चंचल सी! कंचन है जगत के कथित कथा , और पावन जग के कर्म सभी!! चलती है हवा ले कर जगती का,
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वशुधा-अम्बर का अचल साथ
कर लाख कोशिशें शिद्दत कि, मुद्दत से पाए राह किरण! वशुधा-अम्बर का अचल साथ, दे रही किरण इस वशुधा पर!! पर किरण न कोई पंख रखे,
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चलकर गिरना गिरकर चलना
चलों तो राह हर वक्त नयी, क्या धरा पड़ा दोहराने मे! चलकर गिरना गिरकर चलना, है धरा पड़ा नज़राने मे!! खाकर ठोकर गिरता है मनुज,
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भारत को अचल संतृप्त करूं
कहता अभिनन्दन कर अभीवादन, ज़रा तम अधरों को दिप्त करुं! भरकर उजियारा अंधकार मे, धरा को ज्ञान से लिप्त करूं!! धरती कि शख्तियां
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गर देख लिया क्या बुरा किया
गर लाख कोशिशें हो शिद्दत कि, तब मिलतें हैं दो चार नज़र! चलतें ही रहें कर ध्यान मग्न, मंज़ील के राह कि डगर- डगर!! कभी व्यस्त मिलें
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हर राहों मे युंहीं चले चलो
व्यथा को बनाकर दिप्त दिप्त, हर राहों मे युहीं चले चलो! चाहत को दबाकर हृदय मे, विश्व को तुम धारण कर लो!! व्यथा चाहत का अमर कुंज,
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दोस्ती
खूबसूरत एहसास है दोस्ती नए रिश्ते का पैगाम है दोस्ती अपनों से ज्यादा अपनापन निभाती है दोस्ती कभी हंसती तो कभी रूठ जाती है त किसी उम्�
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