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बगिया
शीर्षक। " बगिया" फिर बसंत आएगा अभी तो मौसम है पतझड़ का खिलेंगी कलियां बैठेंगे भौंरे आनंद उठाएं
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एक कदम लक्ष्य की और
शीर्षक। " एक कदम लक्ष्य की ओर" तू राही है इन गलियों का अभी कहा तू रुक जायेगा तलाश है जो तुझको मोती क�
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आशाओं का रेखा पर
आशाएं है शून्य शिखर पर मन में कुछ सवाल हर मोड पर कुछ रुक जाना हर रास्ते पर पूर्णविराम जीवन अंधेरे में दीप �
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साहसी विद्यार्थी
"साहसी विद्यार्थी" अंधेरे से कमरे में एक मैं और एक मेरा सपना वो जलती मोमबत्ती वही पढ़ाई का टेबल
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चांदनी रात
"चांदनी रात" रात प्यारी सुहानी सी कुछ अच्छी कुछ डरावनी सी चांद निकलने वाला है अभी रात कहा हुई अभी घर में उ�
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बेरोजगारी
बीतते हुए साल में महामारी और रंजिशो के हाल में रिश्तों की टूटती डोर को आओ मजबूत करे इस नए साल में आशाओं जिम्मे
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राग विरागिनी
" राग - विरागिनी" मन है चंचल मन है विहवल एक प्रेम रागिनी फिरती है मन में पीड़ा लिए हुए राग- विराग में चलत�
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सच्चा राही
"सच्चा राही" निकल पड़ा तू रास्ते पर मन में कुछ अरमान लिए दुनिया को अपना मान कर कुछ करने की अब ठा�
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ठंड की धूप
"ठंड की धूप" कुछ बादल काले काले कुछ पानी से भरे हुए है कुछ ढक लेते सूरज को धूप नही आ पाएगी ये बादल देखो कितन
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स्वर्ग और सैनिक
"स्वर्ग और सैनिक" कर्म तुम्हारे अच्छे नही ऐसा लोग कहते है क्या जायेगा तू स्वर्ग में ऐसा क्यों कहते है? गर �
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सारथी कृष्ण
"सारथी कृष्ण" जब साथ हो भगवान खड़े रे आदमी तू कहे को डरे अर्जुन तीर चला न पाते गर कृष्ण सा सारथी न पाते.. क
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मैं कवि हूं
मैं कवि हूं मैं मन पढ़ता हूं मैं बहती नदियों में तेज हवाओं में आसमा की बुलंदियों में स्वर ढूंढता हूं �
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