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कविताएँ
सार्थक जीवन
था कर गुज़रने का जज़्बा, ज़िंदगी पल भर की। अग्नि में तपकर एक लोहा, फाल बन गया हल की। धरती के दामन के संग, कृषक का हमराही। घिस -घिसके घिस ग�
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रिश्ता
एक रिश्ता है अपने आप से मेरा जिसे समझने में जिंदगी लग जाती है खुद से बढ़कर कोई फिक्रदार नहीं मेरा धीरे धीरे ये बात समझ में आती है जिन �
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भारत को अचल संतृप्त करूं
कहता अभिनन्दन कर अभीवादन, ज़रा तम अधरों को दिप्त करुं! भरकर उजियारा अंधकार मे, धरा को ज्ञान से लिप्त करूं!! धरती कि शख्तियां
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रश्मी रथी
भगवे का धारन करूण धरा , अविचल धरती सम्मानी हैं! है विश्व को देता अजय दान, सूर्य दया का दानी हैं!! स्वर्ण रथ को धारण कर,
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অমর্তবের আবাজ
আবাজ মনের জা মীটী নেই, ও হৃদযের বেদনা অমর থাকে! জা কর্ম পথ দিযে সোরী নেই, ও নাম ধরা তে অমর থাকে।। নিজ ব্নদন তে অভীন্নদন দে, �
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পরম সু:খম সন্তাপ করম
পরম সূ:খম সন্তাপ করম, অভিদা , নিবিদা পরবস্তী তে! এই মনের নগরকে উচ্চো রাখে, কোতোই বেদনা হারিযে দে।। আপ: হৃদয জোদী কষ্ঢে থাকে,
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मीली हवाओं मे खूशबू
मीली हवाओं मे खूशबू, मूझको लगता कूछ यहां वहां! है एक पहर मे र्दद कई, कूछ अपनो सा कूछ सपनो सा!! झकझोर रही है दृश्य सभी, अ
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चलती है हवा
चलती है हवा ले अधरों से, बिते सारे ऐहसास कई! कूछ उठी धूनी सी सिमट गई, अरमानो के ज़सबात लिए!! ज़सबातो की ले करूण कथा, कि
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बस एक नाम बस नाम नाम
है अविचलताओं कि करूण धरा, मिट्टी आज़ादी की निशानी है! है शुज्ला, सफ्ला देश मेरा, वतन परस्ती जिसकी कहानी है!! हर ज़र्रों के एहसा
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माधुर्य मधूर वाणी कि दिशा
माधुर्य मधूर वाणी कि दिशा, निज कर्मो से मै रोक पाता! कर्म को मिलता तनिक छाह, गर कर्मो से राह मुझे मील जाता!! अविचलता कि हुंकारों स
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अरूनोदय की आश लिए
मैं सोंच रहा था पवन तपोवन, अंतर मन के दृड़ चेतन से! अंधकार की विफल चेष्टा, अरूनोदय की आश लिए!! करूण चेष्टाओं की ध्वनी,
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दिपावली
बालमिक रिषी कर्मों को, करता हूं नमन मैं श्रद्धा से! तूलसी को नमन है कोटी - कोटी, मेरी प्रमार्थ की अविधा से!! चरितार्थ नाम को दिव�
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