सायंकाल का प्रहर -
जिसे देती विदाई कोई ;
सुरबाला सी नारी -
पहन के सफेद साड़ी ,
विदाई दे रही है -
सज - धज कर ;
लेता विदाई दिनकर -
नींद की तैयारी read more >>
नियति का न कोंई तोड़ !
नियति जब खोले पोल !!
हवस की गठरी भर नहीं पाए !
कर्म की लेखी मिट नहीं पाए !!
कर्म के जैसे बीज लगाए !
फूट के वो ही बाहर आए read more >>
//...कोरोना उपरांत...//
बीत रहे अब ,
दुख और भय से ,
अवसाद भरे दिन,
टूट रही है कड़ी ,
दूसरी लहर की...!
धीरे-धीरे ही सही,
फिर से रौनक लौट
रही है मे� read more >>
अच्छे अच्छे को ख्वाब दिखा देती है ,
धन-दौलत भी क्या है |
पता नही भगवान ने ऐसा क्या बनाया है ,
आज धन-दौलत की दुनिया है ,
अच्छे – अच्छे को चक� read more >>