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कविताएँ
सर झुका जाते हैं
कुछ सपने बंद से नहीं खुली आंखों से भी देख लिए जाते हैं, सुख नयनों में बेसुमार अश्क भर लिए जाते हैं, पुष्प माली के समक्ष अदब से सर झुका जा
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मेरे देश मे! प्यार बढ़ जाये
निकल जाये ! निकल जाये निकल जाये! मेरे देश से ! धर्म भेद निकल जाये मेरे देश मे ! प्यार ही बढ जाये अब छोड बी दो ! ये सब नाराजीया आओ सबी भाई ब�
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मैंने क्या बिगड़ा था
मैंने क्या बिगड़ा था जो मुझे इस नज़रिए से देखा जाता है मैंने क्या बिगड़ा था क्या ये गलती है मेरी की मै एक गरीब हूं तो क्या मेरी कोई ए
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// ...दे लात... //
छत्तीसगढ़ में तनख्वाह निकालने के एवज में बकरा भात की मांग और अनुकंपा नियुक्ति में रिश्वतखोरी घटना पर मेरी एक छोटी सी सम-सामयिक रचना.....
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ज़िन्दगी कहां है तू
ज़िन्दगी कहां है तू ढूंढू तुझे हर जगह कभी सपनों में तो कभी ख्वाबों में ज़िन्दगी कहां है तू जिस जिंदगी की हम तलाश में है जिस जिंदगी �
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चलो लम्हे चुराते है
चलो लम्हे चुराते है जो रेत सी हाथों से फिसलती जा रही आज उसको कैद करते है चलो लम्हे चुराते है थोड़ा सा लम्हे को जी लेते है उनसे कुछ ख्व�
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नमन मेरी मातृभाषा
नमन मेरी मातृभाषा नमन उस भाषा को जो हमें संस्कार देती है नमन मेरी हिन्दी को जो भावों को संचार देती है ! बड़ी
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कविता, आतंकवाद से लडे़।
हिंदू मुस्लिम ईसाई सरदार। खत्म करे देश का आतंकवाद। आतंकवाद मानवता का दुश्मन। इसे मिटाना हर नागरिक का कर्त्तव्य। आंतक का न मजहब है
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डोर की व्यथा
कोई नहीं सुनता, दुनिया में व्यथा डोर की। सब अपनी- अपनी बेचते, कौन बेचता कमज़ोर की। पतंग परवान चढ़, मेरे बल नाचती। मेरे छोर से और बनती, दु
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* वादा-खिलाफी *
#समसामयिक ** वादा-खिलाफी ** हाथ में, गंगा जल को लेकर, बंद करने का, वादा को कर, यह चीज खराब । सत्ता की सरकार दुकान में हो या हो घर पर, ब�
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बेटियां
बहुत खुश होता है ऊपरवाला तब गोद में आती हैं बेटियां युग कितने भी बदले आज भी लक्ष्मी ही कहलाती हैं बेटियां जिम्मेदारियां पड़े तो रि�
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आज
अब झूठे आरोपों से कोई सीता वनवास नहीं सहेगी भरी सभा में कोई द्रौपदी अब अपमान नहीं सहेगी कोई भी मेरा अब प्रेम में विषपान नहीं करेगी
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