Anilkumar Rathwa (Sameer) 17 Feb 2026 ग़ज़ल समाजिक #Google#Gazal#motivational# 11544 0 Hindi :: हिंदी
लिखने बैठूँ तो ज़माने भर के मंज़र कम हैं, मेरी आँखों में जो छुपे हैं, वो समंदर कम हैं। जिन्हें डर है कि बयाँ करने से शब्द घट जाएँगे, वो नहीं जानते कि ख़ामोशी के तेवर कम हैं? उतार दे काग़ज़ पे अपने हर ज़ख्म की तपिश, मत सोच कि तरकश में तेरे अभी तीर कम हैं। ये जो स्याही की बूंद है, ये लहू है तेरा, किसे परवाह कि पन्नों पे अभी अक्षर कम हैं। उठ और लिख अपनी कहानी अपनी ही ज़ुबान में, तुझसे बड़ा कोई नहीं, यहाँ सब सिकंदर कम हैं।