संदीप कुमार सिंह 10 Aug 2026 ग़ज़ल समाजिक मेरी यह ग़ज़ल सामाजिक सद्भावना बनाए रखने के लिए है. 318 0 Hindi :: हिंदी
ग़ज़ल आज तो नरम हवाए हैं, बेरुखी में अदा जगाए हैं। लोग आज ख़ुशी रगों में रख, प्यार को ही आजमाए हैं। खाल बात की मत निकालो जी, सत्य बात फिजा महकाए हैं। चाल हाल सभी चले सरपट, समय ही यह सब सिखाए हैं। राज को अब राज रहने दो, फूल ही जहाँ खिलाए हैं। आज चाँद रात में आये, तब धरा को जगमगाये हैं l नाज रोज करें यहां हम सब, दिल खुदा से मिलाए हैं। शायरी संदीप की गजब ढ़ाये, क्योंकी अपनी जान लगाये हैं l (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह*Author*
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....