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तिरंगा मेरी जान है

Dharmpal Saroj 11 Aug 2026 कहानियाँ देश-प्रेम तिरंगा मेरी जान है इमोशनल स्टोरी, देशभक्ति की कहानी, देश प्रेम और स्वभाव से लिखी हुई कहानी, 433 0 Hindi :: हिंदी

शहर से बहुत दूर पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था—देवगढ़।

गाँव छोटा था, लेकिन वहाँ रहने वाले लोगों के दिल बहुत बड़े थे। उसी गाँव में एक बूढ़ी माँ रहती थी—जानकी देवी।

जानकी देवी का इकलौता बेटा वीर सेना में था।

वीर जब भी छुट्टी पर गाँव आता, सबसे पहले अपनी माँ के पैर छूता और फिर घर के बाहर लगे तिरंगे को सलाम करता।

एक दिन माँ ने उससे पूछा,

"बेटा, तू रोज इस झंडे को सलाम क्यों करता है?"

वीर मुस्कुराकर बोला,

"माँ, क्योंकि इसी झंडे के नीचे हम आज़ाद होकर साँस लेते हैं। और अगर कभी जरूरत पड़ी, तो इसी झंडे की खातिर अपनी साँस भी दे देंगे।"

माँ ने उसकी बात सुनी और चुप हो गई।

उसके बाद वीर फिर सीमा पर चला गया।

दिन गुजरते गए।

एक शाम गाँव के डाकिए ने जानकी देवी के घर का दरवाजा खटखटाया।

उसके हाथ में सेना की मुहर लगा एक लिफाफा था।

जानकी देवी ने लिफाफा देखा तो उनका चेहरा बदल गया।

उन्होंने काँपते हाथों से पत्र खोला।

वीर सीमा पर वीरगति को प्राप्त हो चुका था।

कुछ पल के लिए जैसे पूरी दुनिया शांत हो गई।

माँ ने पत्र को सीने से लगा लिया।

आँखों में आँसू थे, लेकिन उन्होंने किसी के सामने रोने से इनकार कर दिया।

अगले दिन सेना के जवान वीर का पार्थिव शरीर लेकर गाँव पहुँचे।

पूरा गाँव सड़कों पर खड़ा था।

वीर के शरीर पर तिरंगा लिपटा हुआ था।

जानकी देवी धीरे-धीरे आगे बढ़ीं।

उन्होंने तिरंगे को देखा।

फिर बेटे के चेहरे को देखा।

उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

लेकिन उन्होंने तिरंगे को अपने माथे से लगाया और कहा,

"मेरा बेटा चला गया, लेकिन मेरा देश जिंदा है।"

पास खड़े एक जवान की आँखें भी नम हो गईं।

उसने कहा,

"माँ, वीर आखिरी समय तक देश का नाम ले रहा था।"

जानकी देवी ने पूछा,

"उसने कुछ कहा था?"

जवान ने सिर झुकाकर कहा,

"हाँ माँ। उसने कहा था—मेरी माँ से कहना कि वह रोए नहीं। मैंने अपनी जिंदगी किसी के लिए नहीं, अपने देश के लिए दी है।"

जानकी देवी ने आँसू पोंछ लिए।

उन्होंने बेटे के माथे पर हाथ रखा और बोलीं,

"पगले, तूने तो माँ को रोने की इजाजत भी नहीं दी।"

अंतिम संस्कार के बाद गाँव के लोग वापस लौटने लगे।

लेकिन जानकी देवी वहीं बैठी रहीं।

उनकी नजर उस तिरंगे पर थी, जो हवा में लहरा रहा था।

एक छोटा बच्चा उनके पास आया और बोला,

"दादी, आपका बेटा तो चला गया। अब आप अकेली हो गईं?"

जानकी देवी ने बच्चे को अपने पास बैठाया।

उन्होंने कहा,

"नहीं बेटा। मेरा एक बेटा गया है, लेकिन इस देश में मेरे लाखों बेटे हैं।"

बच्चे ने पूछा,

"क्या मैं भी आपका बेटा हूँ?"

जानकी देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

"हाँ बेटा, अगर तू अपने देश से प्यार करेगा, तो तू भी मेरा बेटा है।"

उस दिन से उस गाँव में एक नई परंपरा शुरू हुई।

हर साल स्वतंत्रता दिवस पर गाँव के बच्चे जानकी देवी के घर जाते।

वह उन्हें वीर की कहानी सुनातीं।

वह कहतीं,

"देशभक्ति सिर्फ सीमा पर लड़ने वालों की जिम्मेदारी नहीं है। किसान जब ईमानदारी से अन्न उगाता है, शिक्षक जब बच्चों को सही शिक्षा देता है, मजदूर जब मेहनत करता है, डॉक्टर जब मरीज की सेवा करता है और एक बच्चा जब अपने देश की इज्जत करना सीखता है—तब भी देश मजबूत होता है।"

कुछ वर्षों बाद जानकी देवी भी इस दुनिया से चली गईं।

लेकिन उनके घर के बाहर लगा तिरंगा आज भी लहराता रहा।

गाँव के लोगों ने उस जगह एक छोटा-सा स्मारक बना दिया।

उस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—

"जिस माँ ने अपना बेटा देश को दे दिया, उसने कभी तिरंगे को झुकने नहीं दिया।"

हर साल स्वतंत्रता दिवस पर पूरा गाँव वहाँ इकट्ठा होता।

बच्चे तिरंगे को सलाम करते।

और हवा में लहराता हुआ तिरंगा जैसे कहता—

"शहीद चले जाते हैं, लेकिन उनका सपना कभी नहीं मरता।"

जय हिंद। 🇮🇳
वंदे मातरम्।

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