संदीप कुमार सिंह 10 Aug 2026 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता बता रही है की कोई भी चीज़ या कोई भी नियम कितना से कितना बढ़िया क्यों न हो उसमें बदलाव की गुंजाइश हमेशा रहती है. 347 0 Hindi :: हिंदी
चलते चलते बोझिल होने पर ठहराव ही है जरूरी, रहते रहते एक ही छत के नीचे बदलाव ही है जरूरी। संसार में गम बहुत हैं इसलिए प्यार निभाना ही है ज़रूरी, यहां कुछ भी अटल नहीं है इसलिए बदलाव ही है जरूरी। जन्म _मृत्यु का खेल भी बदलाव की ही है जरूरी, बीज से पौधा फिर फूल_फल देकर खत्म होना बदलाव की ही है जरुरी। मौसम के रंग भी बदलते रहते हैं यह भी बदलाव की ही है जरूरी, कली से फूल से मुरझाना यह भी बदलाव की ही है जरूरी। समय का बदलना सत्य है यह भी बदलाव की ही है जरूरी, प्यार के किरणों को बिखेरना यह भी बदलाव की ही है जरूरी। भोजन हर दिन अलग_अलग करना यह भी बदलाव की ही है जरूरी, प्यार में कभी कभी फसाना हो जाता है यह भी बदलाव की ही है जरूरी। बेहतर से बेहतरीन बनाए जाते हैं यह भी बदलाव की ही है जरूरी, आदि काल से लेकर आधुनिक मानव समाज बदलाव की ही है जरूरी। हर हाल में किसी में भी सुन्दर बनाने की गुंजाइश रहती है यह भी बदलाव की ही है जरूरी, चांद पर पहुंचने का खेल जारी है यह भी बदलाव की ही है जरूरी। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह*Author*
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....