Monu kumar 24 Jun 2026 गीत राजनितिक NITISH KUMAR BIHAR CM PM BIHAR NARENDRA MODI LALU YADAV 2141 0 Hindi :: हिंदी
वह दौर था 1951 का, कल्याणबीघा के गाँव में जन्मे थे जी। बचपन से सपना लिए थे, सुधारेंगे बिहार को एक दिन जी। किस्मत को कुछ और मंजूर था, पहुँचे पटना इंजीनियरिंग कॉलेज में। बन गए एक इंजीनियर, पर मन लगा था राजनीति में। जयप्रकाश के आंदोलन में पहुँचे, संघर्ष का रास्ता चुना था जी। इमरजेंसी के कठिन दिनों में, जेल भी जाना पड़ा था जी। जेपी के थे सच्चे सिपाही, उनके बड़े ही प्यारे थे। फिर आया वर्ष 1985, विधायक बनकर उभरे थे। 1990 का दौर भी आया, लालू जी को आगे बढ़ाने गए। लेकिन राजनीति की राहों में, मतभेदों के बादल छा गए। 1994 की कुरमी चेतना रैली, बिहार में नई उम्मीद लाई। लोगों को दिखने लगा, एक नए मुख्यमंत्री की परछाई। समता पार्टी का गठन किया, अपनी अलग पहचान बनाई। फिर अटल जी की सरकार में, रेल और कृषि की जिम्मेदारी पाई। साल 2000 में मुख्यमंत्री बने, पर केवल सात दिन की सरकार रही। नियति को कुछ और मंजूर था, मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। हार मानना सीखा न था, संघर्ष उनका चलता रहा। फिर आया साल 2005, बिहार को नया नेतृत्व मिला। सड़कों और बिजली का विस्तार हुआ, गाँव-गाँव विकास पहुँचा। बेटियों को साइकिल मिली, शिक्षा का दीपक घर-घर पहुँचा। 2010 में फिर विजय मिली, जनता का विश्वास बढ़ता गया। देश में चर्चा होने लगी, यह नेता आगे बढ़ता गया। कई लोगों को उम्मीद थी, एक दिन प्रधानमंत्री बनेंगे जी। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था, एनडीए ने मोदी जी को चुना जी। फिर अकेले चुनावी रण में, नीतीश जी ने संघर्ष बुना। हार और जीत के इस सफर में, कभी न हिम्मत को उन्होंने चुना। 2015 का समय भी आया, महागठबंधन संग मैदान सजा। जनता ने फिर विश्वास जताया, विजय का परचम ऊँचा लहरा। राजनीति की राहें कठिन थीं, साथी आते और जाते थे। पर बिहार के मुद्दों पर, वे अपनी बात उठाते थे। कभी एनडीए, कभी महागठबंधन, सियासत का यह खेल रहा। पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर, उनका प्रभाव अटल रहा। नल-जल, सड़क और बिजली से, गाँवों का चेहरा बदल गया। स्कूलों में बढ़ी छात्राओं की संख्या, शिक्षा का दीपक जल गया। साल गुजरते रहे धीरे-धीरे, संघर्ष की गाथा चलती रही। बिहार की राजनीति में उनकी, अलग पहचान बनती रही। कई बार मुख्यमंत्री बनकर, जनता का विश्वास जीता। सफलताओं और आलोचनाओं के बीच, अपना लंबा सफर सींचा। कल्याणबीघा के छोटे से गाँव से, पटना और दिल्ली तक नाम हुआ। संघर्ष, धैर्य और राजनीति का, एक लंबा अध्याय तमाम हुआ। यह कहानी है उस नेता की, जिसने उतार-चढ़ाव सब देखे। गिरकर फिर से उठ खड़ा हुआ, और नए रास्तों की ओर बढ़ते रहे।