sanam kumari shivani 20 Aug 2026 कविताएँ समाजिक 1409 0 Hindi :: हिंदी
जिस रास्ते पे चल रहे
उस पर है छल परे
कुछ देर के लिए माथे पे बल परे
हम सोचने लगे कि लौट चले क्या
फिर सोचा यार छोड़ो चल परे तो चल परे
मुश्किल थी संभालना ही पड़ा घर के वास्ते
फिर घर से निकलना ही पड़ा घर के वास्ते
मजबूरिया का नाम हमने शोक रख दिया
हर शोक ही बदलना पड़ा घर के वास्ते
पत्थर की चमक है न नगीने की चमक हैं
चेहरे पे सीना तान की जीने की चमक है
पुरखों से विरासत में हमें कुछ न मिला था
जो दिख रहा है वो खून पसीने की चमक है
By - Shivani jha