Vikram Bahadur 20 May 2024 कविताएँ अन्य 34326 0 Hindi :: हिंदी
चलता हुँ। अपनी मन मर्जी से मैंने खुद बनाये है। मेरे उसूल खुद की खाली जेब है। मैंने देखी किसी से माँगा नहीं क्यूंकि मैंने खुद बनाये है। मेरे उसूल उतार-चढ़ाव है। मेरी ज़िन्दगी में सबकी औकात है। देखी कभी किसी के आगे खुद को झुकाया नहीं ये है। मेरे उसूल दोस्त के आगे जान तक है। हाज़िर दोगलो की सकल देखना है। मेरे लिए है। फिज़ूल क्यूंकि मैंने खुद बनाये है। मेरे उसूल हुँ।अकेला फिर भी रखता हुँ। खुद दायरे में नार और प्यार है। बेकार क्यूंकि इनसे बढ़कर है। मेरे उसूल झुकता है। ये सिर सिर्फ मेरे महादेव और माँ-बाप के आगे कोई इस विक्रम को झुका दे। ये उनका सपना है। या उनकी भूल चलता हुँ। अपने इन उसूलो पर इन्हे बनाये रखना भी है। मेरे उसूल