Santosh kumar koli ' अकेला' 02 Aug 2024 कविताएँ समाजिक पूॅंछ के रंग 31790 0 Hindi :: हिंदी
लंबी, छोटी, पतली, मोटी, कई रूप रंग। ऋजु, वक्र, गोल, पुछल्ला, विभिन्न आकार संग। आन- बान, सम्मान पूॅंछ, पशु का संबंध अंतरंग। सर जाए कट, हस्ती जाए मिट, हो न पूॅंछ भंग। सबकी, किसी न किसी के आगे, हिलती पूॅंछ। जो हिलाए पूॅंछ, उसकी रहती ऊॅंच। जितनी हिलती पूॅंछ। उतनी नीची मूॅंछ। जितनी लंबी पूॅंछ, उतनी ज्यादा पूछ। होना और न होना, दोनों दशा खलती है। कइयों के न होती है, न दिखती है। फिर भी हिलती है। चाहे स्वयं की हो सुंदर, पर पूॅंछ से पूॅंछ जलती है। पशु की पूॅंछ, इंसान की पूछ चली जाए, उसकी क्या बचती है?