महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 21 Jun 2026 कविताएँ समाजिक #समतौण 2247 0 Hindi :: हिंदी
समतौण एक बुढ़ड़ी बोलण लगी, कि यूंकि सुख-सुविधाऐं सबा गाड़ा बगी कोई कासी कि ना सुणदो ये जमाने पार कणी आग लगी। एक जमानो सो तो जब सास ससुर की दाल ना गलेती बेटा ब्वारी की ते क्या मजाल भीतरे केवल सासुआ की चलेती। अब की ब्वारी ते बिल्कुल ना डरदी ज्यादा बोलो ते अंग्रेजी मा बात करदी। सास-ससुर के खिलाप बेटा के कान भरदी ऐ बाबा, ये जमान ने भी हद करदी।। किसान, खेती बाड़ी भी खूब करतो एक परिवार दु-दुई बल्द रखतो अब त दुई परिवारूं ने एका बल्द रखियों और सौ भी चार-चार दिन तक भुक्या ढकियों। ये भी बड़ी मजबूरी आयगी, कि जब बेटा ने कभी घर नी आणों और बाबा ने सबा डोखरे बेची देई तब हल कोखे लाणों ।। पूस के मईने खूब त्यार मनाते और माघ के मईने ध्याणी घर आती फागोण मा बुरांश खिलते और सभी लोग होली मा मिलते। वसन्त ऋतु की सुन्दरता मा प्रेमी-प्रेमिकाओं कि जिकुड़ी झुरती कुरकुरी ते तब लागती दिल मा जब चैत के मईने घुघुति घुरती।। शादी व्याह मा गैस की लाईट जलाते सबा लोग जमीन पर बैठी के खाणों खाते। कुछ लोग घर की बाणी दारू पीके माचते और रात भर ढ़ोल, रणसिंघिउं पार नाचते।। देवी देवताओं मा भी बहुत शक्ति थी क्यूंकि त्यूंक प्रति लोगु मा बड़ी भक्ति थी कोई दुखः बीमारी मिटाणी, बर्खा लाणी यो सब देवी देवता ही करेते तभी ते लोग आपड़े देवताओं से डरेते। एतरा सब कुछ बदली गोई आमे आपड़ी पुराणी विरासत भी खोई सब नाते रिश्ता भी बिसरी ढोई तभी ते कासी कि ना सुणदों कोई।। रचनाकार-ः महेश्वर उनियाल उत्तराखण्डी