Santosh kumar koli ' अकेला' 12 Aug 2024 कविताएँ समाजिक वर्षा का नज़ारा 37024 0 Hindi :: हिंदी
मौसम ने ली अंगड़ाई, देखो वर्षा ऋतु आई। उमड़ घुमड़कर बादल छाए, बोले मोर पपीहा। जानें किसको, किसकी याद सताई, चलने लगी पुरवैया। बूंद बदन के लगते ही, मन नाचे ता- ता थैया। बच्चों पर, पर फैलाए, बचाने बारिश से गौरैया। मिटी धरती की तन्हाई। देखो वर्षा ऋतु आई। नदी, नालों में आई जवानी, प्रकृति ने श्रृंगार किया। हरियाली की ओढ़ चादर, इंद्रदेव का सत्कार किया। बनाते गिली से घरौंदे, बांध, फूटने पर गद्गद हिया। काग़ज़ की नौका के संग, अठखेली का मजा़ लिया। प्यासे ने, प्यासे की प्यास बुझाई। देखो वर्षा ऋतु आई। कुहू -कुहू कोयल करती, ठंडी चले बयार। वन, उपवन, खेतों में गाया, जाता राग मलार। झूला झूले नगद नवेली, सहेली करती मधुर वार। भीग लहरिया टपक- टपक, गालों पर रंगधार। बारिश झड़ी, तीज, राखी की मिठाई। देखो वर्षा ऋतु आई। मौसम ने ली अंगड़ाई, देखो वर्षा ऋतु आई। गिरी बदली गिरि पर, धूप से आभा का बन जाना। भीगे पक्षियों का मस्ती से, पंख फड़फड़ाना। गुटरगूं- गुटरंगू करके, कबूतर का कबूतरी से बतलाना। देख मौसम की छटा, मयूर का पंख फैलाना। बिछड़े हुए भी साथ, हो लिए हमराही। देखो वर्षा ऋतु आई। इठलाकर बल खाता, झूमकर बरस जाता। बूंद बदन पर लगते ही, विरहिणी का मन हिचकोले खाता। भीग वसन चिपके तन से, तन खुली किताब बन जाता। मौका़ पाकर घूंघट से, चंदा मुंह दिखाता। नीली झील में पंछियों की परछाईं। देखो वर्षा ऋतु आई। मौसम ने ली अंगड़ाई, देखो वर्षा ऋतु आई।