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आओ खेल खेलें
आओ खेल खेलें रंग बिरंगी कश्तियां बनाकर,बारिश के पानी में तेहराकर आओ खेल खेलें, डाल डाल पर चढ़ते जाए, लुक्का चुप्पी को खेल बनाएं आओ �
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शिक्षा की बेल्ट - पेंट को साधे हुए इक बेल्ट हूँ
मैं पेंट को साधे हुए इक बेल्ट हूँ मेरी वज़ह से है रुका ये पेंट मेरी वज़ह से व्यक्ति कोई पहन पाता है कोई भी पेंट टूट जाऊँ मैं अगर , गिर जाय�
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हर जगह तो धुआँ नहीं होता
राह में जो मिले कहूँ उससे मैं तुझे ही तो प्यार करता हूँ जो किसी के शिकार बन बैठे मैं उन्हीं का शिकार करता हूँ।। जब दया ख़त्म हो मेरे भी�
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बता यह शाप कि या वरदान
बनेगा तू मेरा भगवान , नज़र में आ जाये सम्मान। प्रेम तेरा हो ज्यों हिमपात नहीं हो तेरी कोई जात नहीं तू कर मुझसे ही बात सभी पर कर समान बर
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ओ मेरी साँसों के दीप
ओ मेरी साँसों के दीप ! विश्व सदन की जोती बनकर जले सदा तू तारों बीच । है बस जीवन साध यही अब ओ मेरी साँसों के दीप ! चंद्र-कलश �
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असफलता से संघर्ष करते हुए एक कविता
असफलता से कह दो कि अभी मैं हारा नहीं हूं चाहे कितना भी तोड़ लो मुझे पर मैं भी टूटा नहीं हूं गिरकर संभलना संभल के फिर गिरना शायद उसे �
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आलस्य छोड़िए
बहुत समय पहले की बात है, एक बार महात्मा गांधी से एक व्यक्ति देशभक्ति की प्रेरणा से ओतप्रोत, होकर और देशभक्ति के लिए अपना जीवन समर्पित
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हम आज भी ठहरे
बहुत कुछ कहा उस सिमटे लफ्ज़ ने, जैसे सिलबट्टे आ गई हो सोच पर, धीरे धीरे उम्र ढलती गई, जाने कैसे फिर भी वही बात चलती हुई, खामोश बातो को फि�
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जिंदगी - मैं जिंदगी के गम भुलाना चाहती थी
मैं जिंदगी के गम भुलाना चाहती थी उस शख्स के साथ क्या पता था वही गम दे गया जिंदगी भर के लिए. लेखिका प्रेरणा शर्मा
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चल सको तो चलो
राह में कठिनाइयां तो होंगी जो चल सको तो चलो संघर्ष भरा है जीवन का यह पथ जो चल सको तो चलो राह में कई मोड़ भी होंगे जो चल सको तो चलो चलत�
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बेशुमार मोहब्बत
आज का दिन कुछ खास सा है कोई अपना मेरे पास सा है कहता है जो मुझे प्यार से बड़ी माँ उसके लिए प्यार भी बेशुमार सा है।
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मेरी शायरी
अब किसी को अपना क्यों बोलना क्योंकि मैंने लोगों को अपना होकर भी बदलते हुए देखा है । लेखिका प्रेरणा शर्मा
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