सलाम-ए-कायनात-ए-कमाल को
तू है कामिल रचा-ए-हयात को
ये अर्ज़-ए-नियाज़-ए-मुहब्बत भी क्या है
बढ़ा दे तू अब मेहर-ओ-सौग़ात को
सलाम-ए-कायनात-ए-� read more >>
हर शय में वो नूर, वो एक ही चेहरा,
पर आदमी ने कहाँ इत्तेहाद देखा रे।
मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरूद्वारे की क्या बात,
हर दिल की धड़कन में मैं� read more >>