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एक श्येन हो सयाना, उड़ा पारापार। इठलाता, बल खाता, देखा विक्ष पसार। चिड़ी बावली, खेत खोखला, उपजे उपज़ हज़ार । सरसर- सरसर पर फैलाए, चीरे � read more >>
दुनियाँ के रंगीन जो हैं नजारे, जो देते हैं हमें बेहिसाब बहारें। नाना प्रकार की वस्तुएं मेरे लिए, कुदरती सम्पदा है मेरे लिए। ये सारे � read more >>
"जनाब- अद्भुत अचरज देखा हमने"! "ए-तमाम- मंदिर-मस्जिद-चर्च हमने"! "ईश प्रेम में- श्रद्धा और भक्ति को देखा"!! "हमने- सिर्फ मानव मात्र को दे� read more >>
एक लेखक का जीवन भी, बड़ा कठिन होता है । न कोई, साथ देता है, न कोई, काम देता है। मेहनत कर लो, चाहे कितनी ही, जेबें खाली, रह जाती हैं। उसके हि� read more >>
क्यूं गांव खाली, रह गए, जंगल वीरान, रह गए। हंसी गूंजती थी, जिन आंगन में, क्यूं वो सुनसान, रह गए। कोई तो रोके, पलायन को, बचाने हमारी, जड़ों � read more >>
चलत्तें हैं राह मंज़ील को राहीं, स्पनों का नगर बनाने को! स्पनें पलत्तें उन नैनों में, ज़ो ज़गत्तें विश्व ज़गानें को!! निद्रा क� read more >>
ऐ अजनबी आ जरा पास तो आ, कुछ बात तुम कहो कुछ मैं कहूं। फिर धीरे_धीरे दोनों करीब आयेंगे, और मस्ती के नगमें तब गायेंगे। दोनों कि दोस्ती बे� read more >>
जंगल से मंगल है। जंगल है तो पर्यावरण संतुलन बना रहता है। समयानुकूल वर्षा भी होती है। और अच्छी फसल से लोगों में उत्साह भी बना रहता है। आ� read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" दुख का कारण खोजिए,सदा रहें तब मस्त। बुरे चीज से दूर रह, होगा कभी न अस्त।। दुख का कारण खोजिए,� read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" कहने को सब कह रहे,आते सभी न काम। खुद के चलें विवेक से,जीवन हो गुलफाम।। कहने को सब कह रहे,लोग� read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" आता है सच सामने,मंथन जब हो तेज। और दूध का दूध हो,मन में हो अंगेज।। आता है सच सामने,वक्त रहे अ� read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" रोने से क्या फायदा,आगे का यूं सोच। रहो दूर तकलीफ से, जीवन में हो लोच।। रोने से क्या फायदा,ग� read more >>
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