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उनको भी तो हो पता-मुझको उनसे प्यार एक जरा सी भूल हो कर दूं मैं इजहार
#विधा:_कुंडलिया छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" उनको भी तो हो पता,मुझको उनसे प्यार। एक जरा सी भूल हो,कर दूं मैं इजहार।। कर दूं मैं इजहा�
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एक जरा सी भूल-नुकसान करती भारी पीछे और धकेल
#विधा:_रोला छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक जरा सी भूल,नुकसान करती भारी। पीछे और धकेल,चलाए मुझ पर आरी।। रहे निकलती आह,दर्द को फिर दि�
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एक जरा सी भूल से-भारी हो नुकसान और व्यर्थ चिन्ता रहे
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक जरा सी भूल से,भारी हो नुकसान। और व्यर्थ चिन्ता रहे,जाते घट है मान।। एक जरा सी भूल ने,ले ल�
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धरती मां की बात है निराली-सदियों से ये हमसब को है पाली
धरती मां की बात है निराली, सदियों से ये हमसब को है पाली। ममता की जी अदभुत खजाना है, इनसे से ही दुनिया है चल रही। ग्रहों में जो सबसे उत्त
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अपनी औकात-पहली दफा ही दिखा गई
कमब्त, खामोश सा बैठा था। दिल एक जगहाँ के, मन को अचानक एक दंगाबाज की याद आ गई। वो सात जन्म का वादा कर के पहली दफा ही अपनी औकात दिखा गई ।
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अपनी औकात-पहली दफा ही दिखा गई
कमब्त, खामोश सा बैठा था। दिल एक जगहाँ के, मन को अचानक एक दंगाबाज की याद आ गई। वो सात जन्म का वादा कर के पहली दफा ही अपनी औकात दिखा गई ।
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उड़े ए-आवारा मनमौजी बादल देखो
उड़े बादल- मनमौजी है ए-आवारा, सुखा कहीं बाढ़- फिरता है ए-आवारा,, नाना रूप हैं- जगत में खुशी कहीं गम, नाचे कहीं- किसान हैं देखो कहीं गम,,
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जीवन की आस-जब तक सांस में सांस है समझो अभी भी आस है
हर दिन चमकता सूरज, हमको यही बताता है। काली रात हो चाहे, कितनी घनी, फिर उजाला आता है। हार जाओ अगर, लाखों बार, प्रयास करो, फिर भी लगातार। ज�
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मेरा गाँव-वो सुन्दर हमारे खेत खलिहान जो बताते हैं हमारी पहचान
मेरा गाँव वो छोटा सा मेरा गाँव जिसमें चलते हमारे पाव वो सुन्दर हमारे खेत खलिहान जो बताते हैं हमारी पहचान पेट की भुख वाली आग
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कावळ्यांचा पडलाय मोत्यांवर डाव
सांडली पेणातली शाई मला भरता येत नाही, सरपंचा विषय काही बोलता येत नाही. गावात कामे नाही होत आता तस्तीची , गा*त शब्द मोडतो यांचा मस्तीची.
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पिता पर्वत के समान होता है- बाहर से कठोर अंदर से मुलायम होता है
पिता एक पर्वत के समान होता है बाहर से कठोर अंदर से मुलायम होता है झुक जाता है तुम्हारी ख्वाहिशों के लिए क्योंकि उसको तुम्हारी ब�
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मनमानी किसकी चली नहीं किसी का यार
#विधा:_कुंडलिया छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मनमानी किसकी चली,नहीं किसी का यार। ऐसों को हो हाल यह,सदा मिली है हार।। सदा मिली है हार,�
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