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जब मैं निः शब्द हो जाता हूँ, नही सूझता जब कुछ भी तब कलम बोलती है। जब अन्याय की सरगर्मी तेज़ हो, न्याय दबाने के प्रयास हुए तब कलम बोलती read more >>
दुपहरिया- पर कविता तमतमाती चमक लपलपाती लपक लू की गर्म हवाएं बहती दायें बायें छांव भी गर्म पांव भी नर्म जल उठते थे नंगे जब चल� read more >>
प्रकृति के पंचांग में, शरद ऋतु है ख़ास। शुरू होते ही लगाते, अपने-अपने कयास। सजने- संवरने बैठती, लगते कार्तिक मास। धीरे-धीरे खुदरंग मे� read more >>
मन की- तृष्णा तड़पती प्यासी, भटकती सारे जहां में हर कुंभ में- छलकता अमृत की धारा बेगाना- खोजता संसार कूप में -मोती read more >>
प्रेम हृदय की- उपासना है जिसका संबंध, निज स्वरूप या ईश्वर से है प्रेम की- इस धारा में, जो डूबा सो पार संसार का प्रेम-प्रेम- की प्रतिछा read more >>
सिन्दूर पर कविता सिन्दूर के नाम पर क्यों? नारी बंध सी जाती है, अबला बन जाती है तड़प तड़प कर जिंदा ही, मर सी जाती है। सिन्दूर के लज्जा read more >>
मैं पूछती हूँ आपसे क्यूँ मुझे ऐसा लगता है, जब भी देखती हूँ उसको पुराना रिश्ता सा लगता है, उसे पाने के लिए रब पर भरोसा है पूरा यकीन होता read more >>
कितना भी कठिन कार्य क्यूँ न हो भगवान भरोसा करके तो देखो, डटे रहो मुकाम पर सफलता जरूर मिलेगी थोड़ा इंतजार करके तो देखो। read more >>
स्वर्ग -कविता स्वर्ग कहीं ना और, बसा खुद के अंतर में खोज रहे दिन- रात जिसे हम उस अम्बर में सुख ही है वह स्वर्ग जिसे हम � read more >>
जब भी मैं अकेला बैठता हूँ तो, याद आता है मुझे अपना बीता हुआ कल.. जो झंगझोर कर रख देता है मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व.. और डुबो देता है मुझे दु� read more >>
अभी अभी तो शाम हुई है, सुबह होने बाकी हैं, अभी तो सपने देखे हैं पूरे करने बाकी हैं। read more >>
जाने क्यों कुरेधती हैं मन की मलाल, जो बीत गया हैं दौर , जाने वो कौन सा दिन होगा, जिसमें भूल जाए वो दौर, आसान नहीं पर नामुमकिन भी नहीं, थोड read more >>
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