उम्र की सीमा नहीं ,है ,किस पार जाना,।
कविता कहती है,सफर वहाँ तय हो,
सन्नाटा रहित पनघट जिधर हो,।
तब कहीं छलके भी तो ,यह आंखों का नीर ,
व्यर्थ read more >>
हां, ज़माना बदल रहा है।
यह,समाज को छल रहा है।
बच्चे, दादा-दादी के, सानिध्य में रहते थे।
एक था राजा, एक थी रानी, किस्से सुनते थे।
बहन, बेटी � read more >>
कांच के कंगूरे, कांच की दीवार।
रहने वाले कांच के, कौन करे पत्थर से वार?
इस दुनिया में कांच के, चिरक ढांस हैं घर।
रहने वालों में, अजीब -सा स read more >>
जहां आप, अपने रहकर भी हो लुप्त।
आप ही सुस्थ, बाक़ी सब सुस्त।
जिस शिखर पर आप, अपने बहुत पीछे छूट जाएं।
चाहकर भी आपका, नजरों से नाता टूट जा� read more >>