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आंसू
क्या कहती हो ठहरो नारी । संकल्प अश्रु - जल - से - अपने । तुम दान कर चुकी हो पहले ही जीवन के सोने से सपने । नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो, �
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निराशा क्यों?
दुनिया बेईमानी का खाती है, पर ईमानदारी पूजने वाले भी तो हैं। लोग झूठ के घाट पर नहाते हैं, पर सत्य दरिया में उतरने वाले भी तो हैं। लोग �
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हे! कलम लिख
हे! कलम लिख हे! कलम तू झूठ को झूठ सांच को सांच लिख, तेज तलवार से भी तेज बात को बात लिख। सफ़र हो दूर कितना भी मगर जज़्बात लिख, भरोसे से �
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भीष्म प्रतिज्ञा
भीष्म तेरी प्रतिज्ञा क्या.....? तेरी गौरवगाथा के काम आई मृत्यूस्या पर लेटे-लेटे प्रायश्चित के आंसू ....से शन्न था हृदय जीवन में क्यों प
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हे दामन में दाग
हे दामन में दाग जिनके वो दूसरों में दाग ढूढते है। हो रहा आँखों के सामने, बुरा कितना भी वो देख सब आँखे मुन्दते है। हे ही क्या दोष इसमें �
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बदलाव
अच्छे-अच्छे वक्ताओं की, हुई बोलती बंद। बजरबट्टू हो रहे, समझते थे अक्लमंद। नज़रों से नज़र चुराकर, हो गए नज़रबंद। तर्क का निकालते अर
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मां बाप को मत भूलो,
मां बाप को मत भूलो, ये दिल की गहराई से कहो, उनकी दुलार और प्यार को, हर पल उनको याद रखो। उनकी ममता अनमोल है, उनका स्नेह अमर है, जीवन के �
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चाहत
चाहत कभी न यूं मरे, बड़े स्वप्न को देख। जिन्दा दिल हर पल रहें, प्राण बने नव लेख।। प्राण बने नव लेख,जिसे पढ़कर सब सीखे। और करे उत्कर्ष,रह
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स्पंदित मन
मन ताल जल को, स्थिर करो। चंचल इंद्रियों के तर्ष को, बधिर करो। कंकड़ अकड़ हाज़िरी की, खातिर करो। पानी, पानीय है, मत रुधिर करो। प्रक्�
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मैंने देखा है
मैंने देखा है मैंने देखा है ढलते शाम में घेरे घने अंधेरों को छुट पुट बिखरे विशाल घने घनेरों को लालित्य स्वर्णिम रक्त रंजित उदित �
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अगर सच बोलने का शौक है तो, अकेले रहने का साहस रखो।
सच का सफर अगर सच बोलने का शौक है तो, अकेले रहने का साहस रखो। सच का सफर आसान नहीं होता, इसमें कई मुश्किलों का सामना करना। झूठ की इस दुनिय
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पानी-पानी हो रहा
पानी पानी हो रहा, मौसम है बरसात। सावन भी अब जोर में, हुई सुहानी रात।। पानी पानी हो रहा,भले लोग जो आज। निर्लज खाया लाज को,करता भी है राज।�
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