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उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव खारिज-

virendra kumar dewangan 20 Dec 2024 आलेख राजनितिक political 27514 0 Hindi :: हिंदी

संसद के शीतकालीन सत्र के दरमियान सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच जारी गतिरोध के बावजूद विपक्षी दलों ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पर पक्षपातपूर्ण रवैये का आरोप लगाते हुए अनुच्छेद 67बी के तहत उन्हें पद से हटाने के लिए राज्यसभा के महासचिव को अविश्वास प्रस्ताव सौंप दिया।
अविश्वास प्रस्ताव को राज्यसभा सांसद जयराम रमेश, प्रमोद तिवारी, तृणमूल कांग्रेस के नदीम उल हक और सागरिका घोष ने 10 दिसंबर 2024 को प्रस्तुत किया।
प्रस्ताव पर आप, सपा, तृमूकां, शिवसेना उद्वव गुट, राकांपा शरद गुट, जेएमएम, डीएमके सहित विपक्षियों के करीब 60 सांसदों ने साइन किए।
लेकिन, राज्यसभा व लोकसभा की अंकगणित कह रही है कि विपक्षी दलों को दोनों सदनों में बहुमत हासिल नहीं है।
राज्यसभा में अभी 231 सदस्य हैं. प्रस्ताव को पास कराने के लिए आधे से अधिक अर्थात 116 सदस्यों की दरकार है. जबकि इंडिया ब्लॉक के पास महज 85 सदस्य हैं. कांग्रेस 27, टीएमसी 12, आप 10, डीएमके 10, आरजेडी 5, सीपीएम 4, सपा 4, जेएमएम 3 आईयूएमएल 2 शिवसेना यू 2, एनसीपी शरद 2, सीपीआई 2, एमडीएमके 1 और 1 निर्दलीय।
सत्ताधारी एनडीए के पास 120 सदस्य हैं. भाजपा 95, जेडीयू 4, एनसीपी, अजित 3, मनोनीत 6 और अन्य छोटे दल के सदस्य 10 हैं।
वहीं, 26 सदस्य किसी गठबंधन में शामिल नहीं हैं. इस में बीजेडी 7, एआइएमआइएम 4, एआईडीएमके 4, वायएसआर कांग्रेस 8, बीआरएस 4 और अन्य 3 हैं।
हालांकि संसद के 72 वर्ष के इतिहास में लोकसभा के अध्यक्षों के खिलाफ तीन बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है, लेकिन राज्यसभा के किसी सभापति या उपराष्ट्रपति के खिलाफ पहली बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया।
संवैधानिक प्रक्रिया-लोकसभा के पूर्व जनरल सेक्रेटरी के मुताबिक, भारतीय संविधान के आर्टिकल 67 में उपराष्ट्रपति की शक्तियों का वर्णन है। जबकि आर्टिकल 67बी कहता है कि राज्यसभा के सदस्यों के बहुमत और लोकसभा के सदस्यों के बहुमत से उपराष्ट्रपति को उन के पद से हटाया जा सकता है।
इसके लिए 14 दिन पहले नोटिस देना जरूरी होता है। 14 दिन के बाद संसद में प्रस्ताव पर चर्चा और वोटिंग होगा। चर्चा और वोटिंग के दरमियान उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापतित्व नहीं कर सकेंगे।
इसके पहले कि महाभियोग पर मत-विभाजन होता, उपसभापति हरिवंश ने सभापति पर महाभियोग चलाने के नोटिस को तथ्यों से परे बताते हुए खारिज कर दिया।
उनका कहना है कि इसका उद्देश्य सिर्फ प्रचार करना है। यह उच्च संवैधानिक पद का अपमान है। इस नोटिस को अनुचित, त्रुटिपूर्ण व प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए जल्दबाजी में तैयार किया गया है।
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