ऩजर को लगी ऩजर, दिखाई देते पर दोष।
खुद को तो मानता, गुण-रत्न का कोष।
दूसरों की उघाड़कर, खुद की ढकने का होश।
दूर की जलती सूझे, घर में जले तो read more >>
न मानी की, न ज्ञानी की, न ही भगतों की।
ये दुनिया है, नकटों की।
नकटों के नकटे दोस्त, नकटों की जमात बड़ी।
सारे नकटे एक से, नकटे से नकटे की नज़र � read more >>
दुनिया में, मरण समझदार का।
समझदार समझ से, समझ समझके समझ जाता है।
अरे, वह तो नकटा है,वह नकटाई से ही सुलझ जाता है।
अरे, तू तो समझदार है, वह स� read more >>
न ज़रूरत न हसरत, दूसरों को बदलने की।
ज़रूरत व हसरत है, खुद के सुधरने की।
वे तो न सुधर सके, उनका कोई ख़ता नहीं।
सुधारने के फेर में, खुद कित� read more >>