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क्या लिखू मैं
क्या लिखू मैं? हा मेरा पहला सवाल सब का दबाव मुझ पे उठाओ कलम लिखो क्या लिखू मैं? आज सोचा चलो उठा लो कलम फिर सोचा क्या लिखू मैं हर बार यह
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अंतरिक्ष
कविता-अंतरिक्ष आओ मन के अंतरिक्ष में शैर कर लें। चांद का शीतल प्रभा चित् में पिरोए आज हम शांत कर चित् चेतना ज�
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दलाली का स्तर कितना ऊंचा है
तुम देते हो गाली तुर्कों को लेकिन जिक्र तक नही करते अंग्रेजों का,अपनी किताबों मे और तो और तुम्हारी वाट्सएप युनिवर्सिटी मे मुगलों की
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बदलते रिस्तें
कविता-बदलते रिस्तें अब तो रिस्तों पर भरोसा न रहा रिश्तों का रंग अपनों के संग होते हैं गाढ़े सदा के लिए न होते दुरंग न होंगे कभी भी न
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शबनम -मोती
यौवन युक्त विभावरी, श्रृंगार करे रजनी रानी। जूड़ा खोले, केश सुखाए, छिड़क गया अमृतपानी। अल्हड़ बूंद नादान- सी, धरती पहुंच इतराती। चमचम
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मैं खुद से दूर हो गया
मैं खुद से दूर हो गया हूं, कहा हु में लोगो से ये पूछने को मजबूर हो गया हूं। हंसती खेलती जिंदगानी में पता नहीं कब जिम्मेदारी का बोझ आ गया�
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बेचैन दिल
बेचैन दिल ये मेरा जालिम, कुछ सुनने का अब नाम ना ले । बस दोष मढ़े सर औरो के, खुदपर कोई इल्ज़ाम ना ले।। चाहत तो थी की मैं बनु नेता, पर च�
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शीर्षक (बारिश का मौसम)
शीर्षक (बारिश का मौसम) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) चेहरे पर खुशियाँ आती है काली घटा जब बदल पर छाती है। झूम के पवन फिर गाती है , पेड़ो प�
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में अपने गीत बेचने आऊँगा
ए दोस्त रूठ मत जाना शब्दों को मेरे तोड़ मत जाना / में अपने गीत बेचने आऊँगा में अपने फूल बेचने आऊँगा इन्हे खरीदने भूल मत जाना ए दोस्त र
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गर्मियों के मोसम
गर्मियों के मोसम को में सहता गया पसीना शरीर से मेरे निकलता गया / कभी छांव की तलाश तो कभी पलास की तलाश में में इधर उधर भटकता गया कभी प
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शिक्षा की पहुंच
जाज्वल्यमान मणि, चमचम चमक रही है। दृष्टिवंत क़िस्म, मणिमय दमक रही है। तीक्ष्ण रश्मि अंतरायण, वहीं सिमट रही है। रश्मि से रश्मि, बेमन ल�
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शीर्षक (गर्मी)
शीर्षक (गर्मी) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) मौसम का हाल ना पूछो गर्मी से है बहाल ना पूछो। ऎसी कूलर सब आन है फिर भी घर में बहोत तापमान ह
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