दोहा छंद "सद्गुण"
सद्गुण सरस सुगन्ध से, महकायें जग आप।
जो आयें संपर्क में, उनके हर लें ताप।।
अंकुश रहे विवेक का, यह सद्गुण सिरमौर।
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शीर्षक (मेघराज)
मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर)
हे मेघराज कब तक आओ गे ,
कब हम पर अपनी कृपा बरसाओ गे।
ऊपर से बरस रही है आग नीचे से धरती उगल र� read more >>
विशाल हृदय से हाथ खोल, तुमने सबको स्वीकारा है ।
विश्व ने उसी बड़े दिल को , कायरता कह धिक्कारा है ।
क्या चौखट पर खड़े होकर, घर अपना लुटवाओ� read more >>
अगर विजयी बनाना है, तो पहले खुद को ही जीत।
खुद को ही नहीं जीत सका, औरों की कैसे लिया चीत?
पहला शत्रु काम है, जिससे लड़ना नहीं आसान।'
देव- त� read more >>