बहुत दिनों जो थें परतंत्र ,
लड़ी लड़ाई हुएं स्वतंत्र ,
लागू हुआ है तब जनतंत्र ,
भारत बना‌ है अब गणतंत्र।
इस शुभ दिन की चाह में ,
देशभक्� read more >>
खो जाती हूँ मैं कभी-कभी
गुज़रे दिनों के ख्यालो में ...
क्या होता अगर जी रहे होते हम
आज भी अंग्रेजो के ज़माने में ...
चाबुक खाते, धूल फ़ाख्ते
� read more >>
गहरी अंधेरी रात के बाद, सुहानी भोर आती है
जेष्ठ की तपिश के बाद, घटाएं घनघोर छाती हैं
'यह भी नहीं रहेगा' का भाव, दुःख का दुःख भुलाता है
तू� read more >>