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कविताएँ
मोबाईल
"मोबाईल" फ्री होके भी सबको व्यस्त कर दे वो हैं मोबाईल कुछ ना आते हुवे भी सब सिखा दे वो हैं मोबाईल अपनो से दुर होके भी पास का एहसास दे वो
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अब हुनर आ गया
मांगते थे खुशी पर केवल मिलता रहा गम , होकर निडर चले पड़े गम से लड़ने के लिए हम ।
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जिन्दगी के लम्हे
गुजरती जिन्दगी के सारे लम्हे खूबसूरत ना हो सके तो क्या हुआ... कुछ यादगार लम्हों को ही जिन्दगी की सफलता समझो... -दिनेश कुमार कीर
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बोझल नजरें
दूरियों के दरख्त🌱 अब बढ़कर जंगल हो चले🌴🌳🌲 भीतर होंगे गुल🌻,कलियां🌱,गुलाब🌹,पंछी🕊️,नदी🏞️,झरने🌊,पहाड़ 🏔️ क्या इनसे गुजर कर मिल पाऊ�
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कैसा हूं मैं
इस दुनिया की भीड़ में अकेला हूं मैं झूलती हुई लो-सा हूं मैं है सब यहां मेरे अपने,कहीं ना कहीं अकेला हूं मैं कुछ ऐसा कुछ वैसा हूं मैं अ�
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उज्ज्वल की राहों में
रात बदलती है दिन के लिए, अंधेरा बदलता है उजाले के लिए, सितारे बदलते हैं चन्द्रमा के लिए, तस्वीर बदलती है मोती नयन के लिए, स्वप्न बदलता
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अश्क
मुक्तलाए भूल को बयां करती है आंख जिस्म के अदा को बयां करती है आंख अश्क के दर्द को छुपाती,दिखती है आंख दिल के दर्द को बयां करती है आंख How
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नया सवेरा
चाँदनी के नृत्य में, गहरा सफर है यह, पुनर्निर्माण की खोज में, अनिश्चित समर्थन में। जब चाँद रोता है, और तारे सजग हैं, सहनशील आत्मा है, एक �
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सफ़र ए मुसाफिर
सफर की राहों में, मेरी कहानी बुन रहा हूँ, जो करता हूं वो यादगार, हर लम्हा बना देता हूँ। अनजान नगरों में, दिल से बातें कह रहा हूँ, दुनिया
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मेरी वेदना का कारण
कभी खुश हूं अगर मै तो लोग पूछते है इसका कारण अब खमोश हूँ तो कोई क्यों पूछता नहीं मेरी वेदना का कारण
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चल हवा से कर बातें
दोनों हाथों को फैलाये, महाकाल को पास बुलाये, करें मौत से मुलाकातें, चल हवा से कर लूँ बातें। उड़ता ही जाऊँ बन परिंदा, कर बादलों को शर�
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कर्म से तू भागता क्यों?
कर्म से तू भागता क्यों? क्या बंधा है हाथ तेरे कर्म से तू भागता क्यों? पाव तेरे हैं सलामत फिर नहीं नग लांघता क्यों? नाकामियों ने है डर�
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