virendra kumar dewangan 07 Oct 2024 आलेख दुःखद naxlite problem 36855 0 Hindi :: हिंदी
नक्सलियों की घेराबंदी-
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा व नारायणपुर जिले की सीमा पर, अबूझमाड़ में सुरक्षा बलों ने 4 अक्टूबर 2024 को अब तक का सबसे बड़ा प्रहार करते हुए एक बार में ही 31 नक्सलियों को मार गिराया है। इस मुठभेड़ में ढेर 25-25 लाख रुपये के दो इनामी नक्सली सहित 1.30 करोड़ के अन्य इनामी 16 महिलाएं और पुरुष हैं।
लगता है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का यह संकल्प कि मोदी सरकार 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सली आंतक से मुक्त कर देगी, जमीन पर उतरता नजर आ रहा है। बीते पांच साल में छग में ही करीब 200 नक्सली मारे जा चुके हैं और 500 से अधिक नक्सली आत्मसमर्पित कर चुके हैं।
लेकिन, यह भी कटुसत्य है कि नक्सलियों के खिलाफ ऐसी तेजी तब आई, जब राज्य में बीजेपी की सरकार बनी। इसके पहले छग में कांग्रेसियों की सरकार थी, जो अपने ढुलमुल रवैये से नक्सलियों का ही हितपोषण करती रही। जबकि राज्य कांग्रेस के टॉप लीडरों को नक्सलियों ने झीरम घाटी में मई 2013 में घेरकर मार डाला है।
यह सिद्ध हो चुका है कि नक्सली स्थानीय निवासियों के सबसे बड़े दुश्मन हैं, जो न केवल जंगली इलाकों में स्कूल, अस्पताल, आंगनबाड़ी खुलने नहीं देते, वरन सड़कें व पुल-पुलिया बनने नहीं देते। इसके विपरीत नक्सली ग्रामीणों से उगाही कर उनका शोषण करते हैं। इसी पैसे से नक्सली लीडर शहरों मे ंऐश करते हैं और उनके बच्चे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ते हैं।
यह तथ्य समर्पित नक्सलियों ने पुलिस व मीडिया को अपने बयानों में बताया है कि ज्यादातर टॉप नक्सली लीडर तेलंगाना व आंध्रप्रदेश के हैं। वे आतंक के रास्ते देश में राज करने का मंसूबा पाले हुए हैं और यही टेªनिंग देकर सीधे-सादे ग्रामीणों को बरगलाते हैं और अपने संगठन में शामिल करते हैं।
दूसरा तथ्य यह कि उन्हें खाद-पानी देनेवाले उन शहरी नक्सलियों पर भी शिकंजा कसा जाना चाहिए। ये वे शहरी नक्सली हैं, जो कभी वकील के रूप में, तो कभी राजनीतिज्ञ के रूप में उनकी पैरवी करने लगते हैं। कहा जाता है कि जेएनयू वामपंथी विचारधारा को पल्लवित व पोषित करनेवाला शिक्षण संस्थान है। जबकि जेएनयू सरकारी पैसे से चलता है।
तीसरा यह कि उन्हें हथियार बेचनेवाले लोगों पर भी सरकार की कड़ी निगेहबानी होनी चाहिए। ऐसे दरिंदे, फिर चाहे देश में हों या विदेश में उन्हें उनके अंजाम तक पहुंचाना ही चाहिए।
चौथा उन छद्म मानवाधिकारवादियों को भी बेनकाब करना चाहिए, जो नक्सलियों के मानवाधिकार की चिंता तो करते हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि मानवाधिकार सुरक्षाबलों के परिवारों व नक्सली हिंसा में मारे जानेवाले ग्रामीणों व रहवासियों का भी हुआ करता है।
--00--
सुधी पाठकों से अनुरोध है कि वे लेखक के द्वारा सृजित कहानियों व धारावाहिकों का आनंद लेने के लिए प्ले स्टोर के माध्यम से ‘‘प्रतिलिपि एप’’ डाउनलोड कर सकते हैं और उसमें ‘‘वीरेंद्र देवांगन’’ सर्च करके लेखक की तमाम रचनाओं को पढ़कर समीक्षा में बता सकते हैं कि उसमें रोचकता है या नहीं।
--00--
लेखक-परिचय लेखक शासकीय सेवा से सेवान�...