मारूफ आलम 30 Mar 2023 ग़ज़ल प्यार-महोब्बत # समाजिक शायरी # गजल# rahshymay 106797 0 Hindi :: हिंदी
एक रहस्मय दुनियाँ का ख्याल मन मे पाले हुए घर से निकला था मैं,चेहरे पर नकाब डाले हुए मरते वक़्त भी दूरी गवारा ना की उसने मुझसे हाथ थामे रहा आखिर तक,पास मे बिठाले हुए इस ख्याल से दर पर मेरे आया था हाकिमे शहर बहुत वक़्त हुआ पगड़ी किसी की उछाले हुए पल नही,दिन नही,सदियों पर सदियाँ गुजर गईं लम्बा अरसा गुजर गया उसे दिल से निकाले हुए तुम यहाँ मजे से शहर की आबोहवा लेते हो,और वो वहाँ नफरत से भरा बैठा है खूं को उबाले हुए मारूफ़ आलम