कवि राजवीर सिकरवार 30 Mar 2023 गीत समाजिक 51726 0 Hindi :: हिंदी
बस अब गीत नहीं लिखने हैं-
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- एक गीत आपकी समीक्षार्थ-
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बस अब गीत नहीं लिखने हैं ।
कागज, कलम और स्याही सब, बन्द पिटारी में रखने हैं =
बस अब गीत नहीं लिखने हैं ।
1 -
अश्लीली साहित्य शहर में, महँगा हाथों - हाथ बिक गया ।
फिर भी माँग रही जोरों पर, जन मानस का भाव दिख गया ।
गीतों के संकलन सड़क पर, रद्दी भाव लगे बिकने हैं =
बस अब गीत नहीं लिखने हैं ।
2-
पश्चिम लय पर फूहड़पन के, गीतों का अब चलन हो गया ।
देश भक्ति के गीत मर गये, अय्याशी ये वतन हो गया ।
जन-जन के घर दीवारों पर, नंगे चित्र लगे दिखने है =
बस अब गीत नहीं लिखने हैं ।
3-
बजती धुनें विदेशी जब जब ,प्रेमी युगल मचल जाते हैं ।
देश - राग की सरगम छूटी, फूहड़ गीत, गजल गाते हैं ।
टूटी मर्यादाएं सारी , दिखते सभी घडे चिकने हैं =
बस अब गीत नहीं लिखने हैं ।
4-
हुई राजभाषा की दुर्गति, तार - तार हो गई सभ्यता ।
मृत्युसेज पर स्वाभिमान है, खो बैठी संस्कृति भव्यता ।
इस बेशर्म जमाने में अब, अपने पाँव नहीं टिकने हैं =
बस अब गीत नहीं लिखने हैं ।
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राजवीर सिंह
सबलगढ़ मुरैना म.प्र