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मातृभूमि की पुकार

Dharmpal Saroj 12 Aug 2026 कहानियाँ देश-प्रेम मातृभूमि की पुकार हिंदी कहानी, मातृभूमि की पुकार हिंदी देश प्रेम की इमोशनल स्टोरी, देशभक्ति की हिंदी कहानी 269 0 Hindi :: हिंदी

मातृभूमि की पुकार

रात का समय था।

आसमान पर बादल छाए हुए थे और पहाड़ों के बीच से आती ठंडी हवा पेड़ों को इस तरह हिला रही थी, जैसे प्रकृति स्वयं किसी अनहोनी की आहट सुन रही हो।

भारत की उत्तरी सीमा से कुछ दूर एक छोटा-सा पहाड़ी गाँव था—वीरपुर।

गाँव के चारों तरफ ऊँचे पहाड़ थे। नीचे गहरी घाटी थी और उसके बीच से एक नदी चाँदी की रेखा की तरह बहती थी। सुबह जब सूरज पहाड़ों के पीछे से निकलता तो पूरा गाँव सुनहरी रोशनी में नहा जाता।

वीरपुर की सबसे बड़ी पहचान उसका पुराना विद्यालय था।

विद्यालय के आँगन में एक विशाल बरगद का पेड़ था और उसके सामने पत्थर के चबूतरे पर हमेशा तिरंगा लगा रहता था।

गाँव के लोग कहते थे कि उस तिरंगे की कहानी बहुत पुरानी है।

लेकिन उस कहानी को पूरा कोई नहीं जानता था।

विद्यालय का सबसे बुजुर्ग शिक्षक था—आचार्य देवदत्त।

उम्र लगभग अस्सी वर्ष।

सफेद दाढ़ी, झुकी हुई कमर और हाथ में हमेशा एक पुरानी लकड़ी की छड़ी।

लेकिन उनकी आँखों में आज भी ऐसी चमक थी, जैसे उनके भीतर कोई दीपक लगातार जल रहा हो।

वह दीपक था—मातृभूमि के प्रति प्रेम का।

हर सुबह सूरज निकलने से पहले देवदत्त विद्यालय पहुँचते।

तिरंगे के सामने खड़े होते।

अपनी छड़ी एक तरफ रखते।

सीना सीधा करते।

और कुछ क्षण आँखें बंद करके कहते—

“हे भारत माता, जब तक मेरी साँस चले, मेरे भीतर तेरे प्रति सम्मान कभी कम न हो।”

एक दिन गाँव के कुछ बच्चों ने उनसे पूछ लिया,

“गुरुजी, आप रोज तिरंगे से इतनी बातें क्यों करते हैं?”

देवदत्त मुस्कुराए।

उन्होंने बच्चों की ओर देखा और कहा,

“क्योंकि बेटा, तिरंगा कपड़ा नहीं है। इसमें इस देश की मिट्टी की खुशबू है, किसानों का पसीना है, माताओं की प्रार्थना है, युवाओं के सपने हैं और उन अनगिनत लोगों की याद है जिन्होंने भारत को अपना सर्वस्व माना।”

बच्चे चुप हो गए।

लेकिन उसी दिन देवदत्त ने उन्हें एक ऐसी बात बताई जिसे सुनकर सबके मन में सवाल पैदा हो गया।

उन्होंने कहा—

“इस विद्यालय के नीचे मातृभूमि से जुड़ा एक रहस्य छिपा है।”

बच्चों की आँखें फैल गईं।

“कैसा रहस्य?”

देवदत्त ने जवाब नहीं दिया।

उन्होंने केवल विद्यालय के पुराने बरामदे की तरफ देखा।

और धीरे से कहा—

“जब सही समय आएगा, भारत की मिट्टी खुद अपनी कहानी सुनाएगी।”

---

उस रात गाँव में अचानक बहुत तेज बारिश शुरू हो गई।

बिजली चमक रही थी।

आकाश गरज रहा था।

विद्यालय के पीछे की पहाड़ी से मिट्टी खिसकने लगी।

सुबह जब गाँव वाले उठे तो उन्होंने देखा कि विद्यालय की पिछली दीवार का एक हिस्सा टूट गया था।

मलबे के नीचे पत्थर का एक पुराना हिस्सा दिखाई दे रहा था।

गाँव के प्रधान ने मजदूर बुलाए।

मलबा हटाया गया।

तभी एक मजदूर की कुदाल किसी लोहे की चीज से टकराई।

ठक!

सब रुक गए।

मिट्टी हटाई गई।

नीचे लोहे का एक पुराना संदूक पड़ा था।

उस पर जंग लगी हुई थी।

लेकिन उसके ऊपर एक चिन्ह बना था—

भारत का नक्शा।

गाँव वालों ने तुरंत देवदत्त को बुलाया।

देवदत्त धीरे-धीरे वहाँ पहुँचे।

संदूक को देखते ही उनके कदम रुक गए।

उनके चेहरे का रंग बदल गया।

प्रधान ने पूछा,

“गुरुजी, आप इसे पहचानते हैं?”

देवदत्त ने काँपते हाथ से संदूक को छुआ।

“हाँ।”

“क्या है इसमें?”

देवदत्त ने कहा—

“हमारी मातृभूमि की एक अधूरी कहानी।”

---

संदूक खोला गया।

अंदर कुछ पुराने कागज थे।

एक कपड़े में लिपटा हुआ तिरंगा था।

एक छोटी-सी मिट्टी की डिबिया थी।

और एक पत्र।

पत्र के ऊपर लिखा था—

“जिस भारतीय के हाथ यह पत्र पहुँचे, वह इसे अपनी मातृभूमि की अमानत समझे।”

प्रधान ने पत्र देवदत्त को दे दिया।

देवदत्त ने पढ़ना शुरू किया।

पत्र लगभग कई दशक पुराना था।

उसमें लिखा था—

“जिस दिन भारत स्वतंत्र होगा, उस दिन हमारी लड़ाई समाप्त नहीं होगी। उस दिन से एक नई जिम्मेदारी शुरू होगी। हमें अपनी मातृभूमि को केवल विदेशी शासन से मुक्त नहीं करना है, बल्कि उसे गरीबी, अशिक्षा, नफरत और स्वार्थ से भी मुक्त करना है।”

पत्र पढ़ते-पढ़ते देवदत्त की आवाज भारी हो गई।

नीचे चार नाम लिखे थे।

वीरेंद्र।

माधव।

सरोज।

नसीम।

चार युवक।

चार अलग परिवार।

लेकिन एक मातृभूमि।

---

गाँव के लोग उत्सुक हो गए।

देवदत्त ने बताया कि ये चार युवक आजादी के दौर में वीरपुर के आसपास के इलाके में सक्रिय थे।

वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे।

लेकिन उनकी सबसे बड़ी लड़ाई केवल अंग्रेजों के खिलाफ नहीं थी।

वे लोगों में देश के प्रति प्रेम जगाते थे।

वे कहते थे—

“आजादी केवल सत्ता बदलने का नाम नहीं है। आजादी का अर्थ है कि भारत का हर व्यक्ति अपने देश को अपना समझे।”

उन चार युवकों ने गाँव-गाँव जाकर लोगों को जागरूक किया।

किसानों से कहते—

“आपका खेत भारत की थाली भरता है।”

बच्चों से कहते—

“आपकी शिक्षा भारत का भविष्य बनाएगी।”

महिलाओं से कहते—

“आपके संस्कार आने वाली पीढ़ियों को दिशा देंगे।”

और युवाओं से कहते—

“भारत को केवल तलवार चलाने वाले वीर नहीं चाहिए। उसे चरित्रवान नागरिक भी चाहिए।”

लेकिन एक दिन अंग्रेज अधिकारियों को उनके बारे में पता चल गया।

उनकी तलाश शुरू हुई।

चारों युवक जंगलों में छिप गए।

एक रात वे इसी विद्यालय के नीचे बने पुराने तहखाने में आए।

उन्होंने वहाँ एक संदूक रखा।

उसमें भारत की मिट्टी, एक तिरंगा और एक पत्र रखा।

फिर उन्होंने एक वचन लिया।

“हममें से चाहे कोई जीवित रहे या न रहे, भारत के प्रति हमारा प्रेम जीवित रहना चाहिए।”

---

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी।

देवदत्त ने पत्र के पीछे देखा।

वहाँ एक और पंक्ति लिखी थी—

“अगर यह संदूक कभी स्वतंत्र भारत में खुले, तो इसमें रखी मिट्टी को देश के चार अलग-अलग कोनों तक पहुँचाना।”

गाँव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

प्रधान ने पूछा,

“इसका क्या अर्थ है?”

देवदत्त ने कहा,

“हमें नहीं पता।”

तभी अचानक संदूक के नीचे एक छोटा-सा कागज मिला।

उस पर भारत का नक्शा बना था।

नक्शे पर चार स्थानों पर निशान थे।

कश्मीर।

गुजरात।

तमिलनाडु।

असम।

और बीच में लिखा था—

“भारत की मिट्टी एक है।”

देवदत्त ने कहा,

“अब इस कहानी को पूरा करना होगा।”

---

गाँव के युवाओं ने चार दल बनाए।

पहला दल उत्तर की ओर गया।

दूसरा पश्चिम की ओर।

तीसरा दक्षिण की ओर।

चौथा पूर्व की ओर।

देवदत्त ने मिट्टी की छोटी-सी डिबिया उनके हाथ में दी।

उन्होंने कहा,

“जहाँ जाओ, वहाँ की मिट्टी लेकर आना। हमें साबित करना है कि भारत की मिट्टी अलग-अलग जगहों पर होकर भी एक ही मातृभूमि की मिट्टी है।”

पहला दल कश्मीर पहुँचा।

उन्होंने पहाड़ों की मिट्टी उठाई।

वहाँ एक बुजुर्ग किसान ने उनसे कहा,

“बेटा, यह मिट्टी अपने साथ ले जाना। इसमें उन लोगों की मेहनत है जो बर्फ के बीच भी खेतों को जीवित रखते हैं।”

दूसरा दल गुजरात पहुँचा।

समुद्र के किनारे एक वृद्ध मछुआरे ने उन्हें मिट्टी देते हुए कहा,

“इसे संभालकर रखना। समुद्र चाहे कितनी भी दूरियाँ बनाए, भारत की धरती का रिश्ता नहीं तोड़ सकता।”

तीसरा दल तमिलनाडु पहुँचा।

एक विद्यालय की शिक्षिका ने उन्हें मिट्टी दी और कहा,

“भाषाएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन जब बच्चे भारत माता कहते हैं तो भाव एक ही होता है।”

चौथा दल असम पहुँचा।

वहाँ एक किसान ने अपने खेत की मिट्टी उनकी हथेली पर रखी।

उसने कहा,

“इसे लेकर जाना और कहना कि पूर्व से पश्चिम तक भारत एक ही परिवार है।”

चारों दल लौटकर वीरपुर आए।

उनके पास चार दिशाओं की मिट्टी थी।

लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।

---

विद्यालय के आँगन में हजारों लोग जमा हुए।

देवदत्त ने चारों मिट्टी को एक बड़े पात्र में रखा।

कश्मीर की मिट्टी।

गुजरात की मिट्टी।

तमिलनाडु की मिट्टी।

असम की मिट्टी।

फिर उन्होंने वीरपुर की मिट्टी भी उसमें डाल दी।

उन्होंने बच्चों से पूछा,

“बताओ, अब कौन-सी मिट्टी किसकी है?”

कोई जवाब नहीं आया।

देवदत्त मुस्कुराए।

“यही भारत है।”

“जहाँ अलग-अलग मिट्टियाँ मिलकर एक मातृभूमि बनती हैं।”

उन्होंने उस मिट्टी को विद्यालय के आँगन में एक नए पौधे की जड़ में डाल दिया।

“यह पौधा भारत की एकता का प्रतीक होगा।”

बच्चों ने तालियाँ बजाईं।

लेकिन उसी रात कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे गाँव को हिला दिया।

---

आधी रात को विद्यालय के पीछे से धुआँ उठने लगा।

किसी ने स्कूल के पुराने दस्तावेजों वाले कमरे में आग लगा दी थी।

गाँव वाले दौड़कर पहुँचे।

आग तेजी से फैल रही थी।

अंदर वही पुरानी डायरी और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े दस्तावेज रखे थे।

देवदत्त भी वहाँ पहुँचे।

उन्होंने चिल्लाकर कहा,

“कागज बचाने हैं!”

युवाओं ने पानी डालना शुरू किया।

लेकिन आग बहुत तेज थी।

अचानक देवदत्त अंदर जाने लगे।

एक युवक ने उन्हें रोक लिया।

“गुरुजी, अंदर मत जाइए!”

देवदत्त बोले,

“बेटा, यह कागज नहीं हैं। यह हमारी स्मृति है।”

लेकिन युवाओं ने उन्हें पीछे कर दिया।

कुछ देर की मेहनत के बाद आग पर काबू पा लिया गया।

अधिकतर दस्तावेज बच गए।

लेकिन संदूक में रखा पुराना पत्र गायब था।

सब परेशान हो गए।

वह पत्र किसने लिया?

क्यों लिया?

और क्यों?

---

अगली सुबह विद्यालय के दरवाजे पर एक कागज मिला।

उस पर लिखा था—

“भारत की मिट्टी को बचाने की कोशिश मत करो। उसे मिटाया नहीं जा सकता।”

देवदत्त ने कागज पढ़ा।

फिर मुस्कुराए।

“यह किसी ऐसे व्यक्ति का काम है जो समझता है कि देशप्रेम कागजों में बंद है।”

उन्होंने गाँव वालों से कहा,

“हमारे पास पत्र नहीं है, लेकिन उसकी भावना हमारे पास है।”

उन्होंने कहा—

“भारत को कोई आग नहीं जला सकती। भारत तब कमजोर होगा जब उसके लोग अपने देश को भूल जाएँगे।”

यह बात पूरे गाँव के युवाओं के मन में उतर गई।

उन्होंने फैसला किया कि वे केवल उस संदूक की कहानी नहीं बचाएँगे।

वे उसके संदेश को आगे बढ़ाएँगे।

---

अगले महीने गाँव में एक अनोखा अभियान शुरू हुआ।

नाम रखा गया—

“मातृभूमि के नाम एक काम।”

हर व्यक्ति को देश के लिए कोई एक अच्छा काम करना था।

किसी ने गाँव की सड़क साफ की।

किसी ने गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।

किसी ने पेड़ लगाए।

किसी ने वृद्धों की सहायता की।

किसानों ने तय किया कि वे गाँव के तालाब को बचाएँगे।

महिलाओं ने बच्चों को भारतीय इतिहास की कहानियाँ सुनानी शुरू कीं।

युवाओं ने नशे और हिंसा से दूर रहने की शपथ ली।

बच्चों ने हर सप्ताह विद्यालय में भारत का नक्शा बनाना शुरू किया।

धीरे-धीरे वीरपुर बदलने लगा।

---

एक दिन वही व्यक्ति पकड़ा गया जिसने विद्यालय में आग लगाने की कोशिश की थी।

वह गाँव का ही एक युवक था—राघव।

लोग उसे देखकर हैरान रह गए।

प्रधान ने पूछा,

“तुमने ऐसा क्यों किया?”

राघव चुप रहा।

फिर उसने कहा,

“मैं चाहता था कि यह पुरानी कहानी खत्म हो जाए।”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझे लगता था कि देशप्रेम सिर्फ भाषण है। मुझे लगता था कि इससे किसी गरीब का पेट नहीं भरता।”

देवदत्त उसके पास गए।

उन्होंने पूछा,

“तुम्हें किसने कहा कि देशप्रेम सिर्फ भाषण है?”

राघव चुप रहा।

देवदत्त बोले,

“अगर भूखे को भोजन देना देशप्रेम नहीं है, तो क्या है?”

“अगर बच्चे को पढ़ाना देशप्रेम नहीं है, तो क्या है?”

“अगर किसान के पसीने की कीमत समझना देशप्रेम नहीं है, तो क्या है?”

“अगर अपने देश को बेहतर बनाने की कोशिश करना देशप्रेम नहीं है, तो फिर देशप्रेम है क्या?”

राघव की आँखों से आँसू निकलने लगे।

उसने सिर झुका लिया।

“गुरुजी, मुझे माफ कर दीजिए।”

देवदत्त ने कहा,

“गलती की सजा मिलेगी, लेकिन अपने देश से प्यार करना सीखोगे तो जिंदगी बदल सकती है।”

राघव ने उसी दिन फैसला किया कि वह गाँव के विद्यालय में बच्चों को खेल और व्यायाम सिखाएगा।

---

कुछ महीने बाद स्वतंत्रता दिवस आया।

इस बार वीरपुर का समारोह पहले से अलग था।

मंच पर बड़े-बड़े भाषण नहीं थे।

किसी ने अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन नहीं किया।

विद्यालय के सामने चार दिशाओं से लाई गई मिट्टी का पौधा अब बड़ा हो चुका था।

उसकी शाखाओं पर छोटे-छोटे फूल खिलने लगे थे।

देवदत्त ने बच्चों को बुलाया।

उन्होंने कहा,

“आज हम तिरंगा फहराएँगे, लेकिन उससे पहले एक काम करेंगे।”

उन्होंने एक मुट्ठी मिट्टी उठाई।

“यह मिट्टी किसकी है?”

बच्चों ने कहा—

“भारत की।”

“कश्मीर की मिट्टी?”

“भारत की।”

“गुजरात की मिट्टी?”

“भारत की।”

“तमिलनाडु की?”

“भारत की।”

“असम की?”

“भारत की।”

देवदत्त की आँखों में चमक आ गई।

उन्होंने कहा—

“यही हमारी ताकत है।”

फिर तिरंगा फहराया गया।

पूरा विद्यालय राष्ट्रगान से गूँज उठा।

लेकिन राष्ट्रगान खत्म होने के बाद देवदत्त ने कोई भाषण नहीं दिया।

उन्होंने केवल इतना कहा—

“देश को याद करने के लिए साल में एक दिन काफी नहीं। मातृभूमि को सम्मान देने के लिए पूरी जिंदगी चाहिए।”

---

उसी शाम देवदत्त अकेले विद्यालय के आँगन में बैठे थे।

उनकी नजर उस पौधे पर थी जिसमें चार दिशाओं की मिट्टी मिली थी।

राघव उनके पास आया।

उसने पूछा,

“गुरुजी, क्या आपको लगता है कि वे चारों लोग आज होते तो खुश होते?”

देवदत्त ने पौधे की तरफ देखा।

“हाँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि उनका सपना किसी किताब में बंद नहीं रहा।”

“उनका सपना क्या था?”

देवदत्त ने कहा—

“ऐसा भारत जहाँ कोई भारतीय अपने ही देश में खुद को पराया महसूस न करे।”

राघव ने पूछा,

“क्या हम वह भारत बना पाएँगे?”

देवदत्त ने मुस्कुराकर कहा,

“भारत कोई एक दिन में नहीं बनता। हर पीढ़ी उसे थोड़ा-थोड़ा बनाती है।”

---

कुछ वर्षों बाद देवदत्त बहुत वृद्ध हो गए।

अब वह रोज विद्यालय नहीं आ पाते थे।

एक सुबह उन्होंने अपनी बेटी से कहा,

“मुझे विद्यालय ले चलो।”

वह उन्हें लेकर विद्यालय पहुँची।

तिरंगा हवा में लहरा रहा था।

चार दिशाओं की मिट्टी से उगा वह पौधा अब एक विशाल वृक्ष बन चुका था।

देवदत्त उसके नीचे बैठ गए।

उन्होंने मिट्टी को हाथ में लिया।

कुछ देर तक उसे देखते रहे।

फिर बोले—

“यही तो मेरी मातृभूमि है।”

उनकी बेटी ने पूछा,

“आपको क्या दिखाई देता है?”

देवदत्त मुस्कुराए।

“मुझे खेत दिखाई देते हैं।”

“मुझे नदियाँ दिखाई देती हैं।”

“मुझे पहाड़ दिखाई देते हैं।”

“मुझे समुद्र दिखाई देता है।”

“मुझे शहर दिखाई देते हैं।”

“मुझे गाँव दिखाई देते हैं।”

“मुझे मंदिर की घंटी और मस्जिद की अजान दोनों सुनाई देती हैं।”

“मुझे अलग-अलग भाषाओं में बोलते लोग दिखाई देते हैं।”

“लेकिन इन सबके बीच मुझे एक ही धड़कन सुनाई देती है।”

उन्होंने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“भारत की।”

---

उस दिन शाम को देवदत्त ने आखिरी बार तिरंगे को सलाम किया।

उन्होंने आँखें बंद कीं।

उनके चेहरे पर शांति थी।

जैसे किसी लंबे सफर के बाद कोई यात्री अपनी मंजिल तक पहुँच गया हो।

उनके हाथ में थोड़ी-सी भारत की मिट्टी थी।

और उनके होंठों पर अंतिम शब्द थे—

“माँ, मैंने तुझे जितना समझा, उतना ही पाया कि तू कितनी विशाल है।”

गाँव में खबर फैल गई।

लोग विद्यालय में जमा होने लगे।

कोई रो रहा था।

कोई चुप था।

लेकिन उस दिन किसी ने तिरंगे को झुकने नहीं दिया।

क्योंकि देवदत्त ने जीवन भर एक बात सिखाई थी—

व्यक्ति चला जाता है, मातृभूमि रहती है।

---

साल बीत गए।

वीरपुर का वह विद्यालय अब एक बड़ा शिक्षण केंद्र बन चुका था।

आँगन का पेड़ अब इतना विशाल हो गया था कि उसकी छाया में पूरा मैदान आ जाता था।

उसके नीचे एक पत्थर लगाया गया था।

उस पर लिखा था—

“यह वृक्ष भारत की चार दिशाओं की मिट्टी से उगा है। इसे उन सभी लोगों को समर्पित किया जाता है जिन्होंने अपनी मातृभूमि को अपने स्वार्थ से ऊपर रखा।”

हर साल बच्चे उसके नीचे बैठते।

उन्हें चार युवकों की कहानी सुनाई जाती।

उन्हें देवदत्त की बातें बताई जातीं।

और सबसे अंत में उनसे एक सवाल पूछा जाता—

“अगर भारत तुम्हें माँ कहता है, तो तुम उसके लिए क्या करोगे?”

हर बच्चा अपना अलग जवाब देता।

कोई कहता—

“मैं पढ़ूँगा।”

कोई कहता—

“मैं पेड़ लगाऊँगा।”

कोई कहता—

“मैं ईमानदार बनूँगा।”

कोई कहता—

“मैं किसी गरीब की मदद करूँगा।”

और एक छोटा बच्चा हर बार एक ही बात कहता—

“मैं भारत को कभी अकेला महसूस नहीं होने दूँगा।”

उसका जवाब सुनकर शिक्षक मुस्कुरा देते।

क्योंकि उन्हें पता था—

देशप्रेम की सबसे बड़ी जीत यही है कि वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँच जाए।

---

एक शाम बारिश के बाद मिट्टी से खुशबू उठ रही थी।

विद्यालय के आँगन में बच्चे दौड़ रहे थे।

तिरंगा हवा में लहरा रहा था।

भारत के नक्शे वाला वह पुराना संदूक अब विद्यालय के संग्रहालय में रखा था।

उसके अंदर कुछ भी कीमती नहीं था।

न सोना।

न चाँदी।

न धन।

सिर्फ भारत की मिट्टी।

एक पुराना तिरंगा।

कुछ कागज।

और चार युवकों का अधूरा सपना।

लेकिन शायद यही दुनिया की सबसे कीमती चीज थी।

क्योंकि सोना किसी एक व्यक्ति का हो सकता है।

धन किसी एक परिवार का हो सकता है।

लेकिन मातृभूमि—

वह हर भारतीय की होती है।

रात होने लगी।

विद्यालय के ऊपर चाँद निकल आया।

तिरंगे की छाया जमीन पर पड़ रही थी।

हवा धीरे-धीरे चल रही थी।

पेड़ के पत्ते सरसराए।

ऐसा लगा जैसे मातृभूमि स्वयं कह रही हो—

“मेरे बच्चों, मुझे केवल याद मत करना।

मुझे अपने कर्मों में रखना।

मुझे अपने व्यवहार में रखना।

मुझे अपने सपनों में रखना।

जब खेत में बीज बोओ तो मुझे याद रखना।

जब किताब खोलो तो मुझे याद रखना।

जब किसी जरूरतमंद का हाथ पकड़ो तो मुझे याद रखना।

जब अपने देश का नाम लो तो गर्व से लेना।

और जब कभी तुम्हारे सामने स्वार्थ और देशहित के बीच चुनाव हो...

तो उस मिट्टी को याद करना जिसमें तुम्हारे पूर्वजों की मेहनत मिली है।”

उस रात वीरपुर के ऊपर आसमान बिल्कुल साफ था।

सितारे चमक रहे थे।

और विद्यालय की छत पर तिरंगा हवा के साथ लहरा रहा था।

किसी ने उसे सलाम नहीं किया।

कोई भाषण नहीं हुआ।

कोई नारा नहीं लगा।

फिर भी उस पूरे वातावरण में देशप्रेम था।

क्योंकि कभी-कभी मातृभूमि के लिए सबसे सुंदर शब्द बोले नहीं जाते।

उन्हें जिया जाता है।

भारत की मिट्टी में।

भारत की हवा में।

भारत की नदियों में।

भारत के खेतों में।

भारत की मेहनतकश हथेलियों में।

भारत के बच्चों की आँखों में।

और उन दिलों में...

जो अपने देश से कुछ माँगने से पहले यह सोचते हैं—

“मैं अपने देश के लिए क्या कर सकता हूँ?”

यही सवाल भारत को मजबूत करता है।

यही सवाल मातृभूमि को महान बनाता है।

और यही वह भावना है जो सदियों से इस धरती को जोड़ती आई है।

क्योंकि भारत केवल एक देश नहीं।

भारत हमारी मातृभूमि है।

भारत हमारी पहचान है।

भारत हमारी साँसों में बसी वह भावना है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता।

और जब तक इस देश की मिट्टी की खुशबू किसी भारतीय के हृदय में जीवित है—

तब तक मातृभूमि की पुकार भी जीवित रहेगी।

समाप्त।

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