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स्वाभिमान पर चोट

डॉ राजेंद्र यादव आजाद 16 Sep 2026 कहानियाँ प्यार-महोब्बत कहानी 1627 0 Hindi :: हिंदी

स्वाभिमान पर चोट
गाँव की धूल भरी पगडंडियों पर दौड़ने वाला वह नौजवान बचपन से ही कुछ अलग था, उसकी आँखों में गाँव की सीमाओं से बहुत दूर तक जाने के सपने थे और सीने में ऐसा आत्मविश्वास था जो गरीबी, अभाव और कठिन परिस्थितियों से भी बड़ा था। किसान परिवार में जन्मे रणवीर सिंह ने बचपन से ही अपने पिता से एक बात सुनी थी—“बेटा, आदमी के पास पैसा कम हो तो कोई बात नहीं, लेकिन इज्जत कम नहीं होनी चाहिए।” शायद यही एक वाक्य उसके पूरे जीवन की धुरी बन गया था। जवान हुआ तो भारतीय सेना में भर्ती हो गया। जिस दिन वह पहली बार वर्दी पहनकर घर लौटा, माँ की आँखों में खुशी के आँसू थे और पिता ने गर्व से उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा था—“अब तू सिर्फ हमारा बेटा नहीं, देश का बेटा है।” रणवीर ने सीमा पर वर्षों तक देश की सेवा की। बर्फीली चोटियों से लेकर तपते रेगिस्तान तक उसने दुश्मन का सामना किया। गोलियों की आवाज उसके लिए जीवन का हिस्सा बन गई थी। उसने अपने कई साथियों को अपनी आँखों के सामने खोया, कई बार मौत को बेहद करीब से देखा, लेकिन हर बार उसके भीतर एक ही आवाज उठती—पीछे मेरा देश है और जब तक साँस है, इस देश की सीमा पर कोई आँच नहीं आने दूँगा। उसकी बहादुरी की चर्चा होने लगी, सम्मान मिले, पदक मिले और अधिकारियों ने उसकी वीरता की सराहना की, लेकिन उसके लिए सबसे बड़ा सम्मान वह था जब गाँव के बच्चे उसे देखकर दौड़ते हुए कहते—“फौजी चाचा आ गए।” समय बीतता गया और आखिर वह दिन भी आया जब रणवीर सेना से सेवानिवृत्त होकर घर लौटा। शरीर पर उम्र का असर था, बालों में सफेदी उतर आई थी, लेकिन चाल में अब भी सैनिक अनुशासन और आँखों में वही तेज था। उसने गाँव लौटकर रहने के बजाय तेजी से बदलते गुड़गाँव को अपना ठिकाना बनाया। उस समय साइबर सिटी अपने विस्तार की ओर बढ़ रही थी। खेतों की जगह कंक्रीट की इमारतें खड़ी हो रही थीं और जमीन की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं। रणवीर ने छोटी-मोटी प्रॉपर्टी का काम शुरू किया। वह कोई बड़ा कारोबारी नहीं बना, लेकिन जितना मिला, उसमें संतुष्ट रहा। उसकी जिंदगी का असलीमकसद तब शुरू हुआ जब उसने अपने आसपास पेड़ लगाने का संकल्प लिया। जहाँ लोग खाली जमीन देखकर मकान और दुकान की संभावना देखते थे, रणवीर वहाँ पेड़ लगाने की जगह तलाशता था। उसने अपने घर के आसपास नीम, पीपल, बरगद, अमलतास और न जाने कितनी देशी-विदेशी प्रजातियों के पौधे लगाए। धीरे-धीरे उसके घर के आसपास का एरिया छोटे-से जंगल में बदलने लगा। वह दूर-दूर से पौधे लाता, उन्हें अपने बच्चों की तरह पालता और लोगों से कहता—“जिस दिन आदमी पेड़ को संपत्ति समझने लगेगा, उस दिन धरती बच जाएगी।” पर्यावरण संरक्षण उसका जुनून बन गया। वह लोगों को पौधे बाँटता, स्कूलों में जाता, बच्चों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करता और जरूरतमंदों की मदद करता। सेना से सेवानिवृत्त एक फौजी धीरे-धीरे समाजसेवी के रूप में पहचाना जाने लगा। लोग उसका सम्मान करते थे और कहते थे कि रणवीर ने सीमा की रक्षा करने के बाद अब धरती की रक्षा का बीड़ा उठा लिया है। लेकिन जिंदगी हमेशा उस आदमी के साथ न्याय नहीं करती जो दूसरों के लिए अच्छा करता है। रणवीर के जीवन में सबसे बड़ा तूफान तब आया जब उसकी जवान बेटी नंदिता एक मनचले युवक के साथ घर छोड़कर चली गई। रणवीर के लिए यह  बेटी का घर छोड़ना नहीं था,  यह उसके वर्षों के संस्कारों, विश्वास और परिवार की प्रतिष्ठा पर लगा गहरा आघात था। उसने बेटी को समझाने की कोशिश की, उसे वापस लाने का प्रयास किया, लेकिन नंदिता ने साफ कहा—“पापा, मैंने अपना फैसला खुद लिया है।” रणवीर के भीतर कुछ टूट गया। उसने क्रोध में कहा—“आज से तू मेरे लिए मर गई।” दरवाजा बंद हो गया, लेकिन उस दरवाजे के दोनों ओर दो लोग टूटकर रो रहे थे—बाहर बेटी और भीतर पिता। रणवीर ने अपनी आँखों के आँसू किसी को नहीं दिखाए। वह फौजी था, उसे दर्द छिपाना आता था। उसने बेटी से सारे संबंध तोड़ लिए, लेकिन सच यह था कि वह जितना नंदिता से दूर होता गया, उतना ही भीतर से उसके करीब होता गया। रातों में वह उसकी बचपन की तस्वीरें देखता, उसके खिलखिलाने की आवाज याद करता और फिर तस्वीरें बंद कर देता। समय आगे बढ़ा। उसका बेटा अभय पढ़-लिखकर वकील बन गया। अभय पिता के स्वभाव को समझता था। वह जानता था कि पिता कठोर जरूर हैं, लेकिन भीतर से बेहद संवेदनशील हैं। वह अक्सर कहता—“पिताजी, आपने जिंदगी देश के नाम कर दी, अब बाकी जिंदगी अपने लिए जिएँ।” अभय ही धीरे-धीरे रणवीर का सबसे बड़ा सहारा बन गया। उसकी शादी हुई। घर में बहू आई। कुछ समय बाद एक छोटी-सी पोती ने जन्म लिया। पोती के आने के साथ रणवीर की सूनी दुनिया जैसे फिर से आबाद हो गई। वह घंटों उसे गोद में लेकर बैठा रहता, उसे पेड़ों के नाम सिखाता और कहता—“देख बिटिया, पेड़ किसी से भेदभाव नहीं करते। जिसकी छाया में बैठो,  वहीँ छाया देता है।” बच्ची उसकी उँगली पकड़कर बगीचे में घूमती और बूढ़े फौजी के चेहरे पर वर्षों बाद एक सच्ची मुस्कान दिखाई देती। उसे लगता था कि जिंदगी ने आखिर उसे दूसरा मौका दे दिया है, लेकिन नियति के पास उसके लिए एक और परीक्षा बाकी थी। रणवीर के घर के एक हिस्से में एक बैंक कर्मचारी किराए पर रहता था। वह अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ वहीं रहता था। किरायेदार होने के कारण दोनों परिवारों में सामान्य मेल-जोल था। समय के साथ रणवीर की बहू और उस बैंक कर्मचारी के बीच निकटता बढ़ने लगी। रणवीर को लंबे समय तक इसकी भनक नहीं लगी, लेकिन एक दिन उसने अपनी आँखों से ऐसा दृश्य देख लिया जिसने उसके भीतर वर्षों से दबे हुए क्रोध को ज्वालामुखी की तरह फोड़ दिया। उसके सामने  बहू और वह व्यक्ति नहीं थे; उसके सामने जैसे उसकी बेटी नंदिता खड़ी थी, वही पुराना घर था, वही बंद दरवाजा था और वही सवाल था—“मेरे संस्कारों का क्या हुआ?” उसके भीतर वर्षों से जमा स्वाभिमान, अपमान, बेटी की पीड़ा, परिवार के प्रति कठोर अपेक्षाएँ और सैनिक जीवन की अनुशासनप्रिय मानसिकता सब एक साथ उफन पड़े। उसे लगा कि उसके घर की मर्यादा उसके सामने कुचली जा रही है। उस क्षण उसने अपने क्रोध पर नियंत्रण खो दिया। वह भूल गया कि जीवन भर उसने हथियार देश की रक्षा के लिए उठाए थे, अपने ही घर को नष्ट करने के लिए नहीं। आवेश में उसने अपनी बहू और उस बैंक कर्मचारी की हत्या कर दी। शोर सुनकर बैंक कर्मचारी की पत्नी और उसके दोनों बच्चे दूसरे कमरे से बाहर आए। वे कुछ समझ पाते, उससे पहले ही रणवीर का विवेक पूरी तरह समाप्त हो चुका था। क्रोध की उस अंधी आँधी में उसके हाथों से एक और भयानक अपराध हो गया और देखते ही देखते चार जिंदगियाँ समाप्त हो गईं। कुछ ही मिनट पहले जिस घर में खुशियां  थी, चहकतीआवाजें थीं, रिश्ते थे और भविष्य के सपने थे, वहाँ अब  भयावह सन्नाटा था। रणवीर कुछ क्षण तक पत्थर की तरह खड़ा रहा। फिर उसके हाथ काँपने लगे। हथियार उसके हाथ से गिर गया। वह वहीं जमीन पर बैठ गया। जिस आदमी ने युद्धभूमि में दुश्मनों की गोलियों के सामने कभी सिर नहीं झुकाया था, वह आज अपने ही अपराध के सामने टूट चुका था। उसकी आँखें सामने पड़ी लाशों पर थीं और मन में  एक वाक्य गूँज रहा था—“मैंने जिंदगी भर देश की रक्षा की, लेकिन आज अपने ही घर को नष्ट कर दिया।” उसकी नजर खिड़की के बाहर गई। वहाँ उसका लगाया हुआ नीम का विशाल पेड़ हवा में झूम रहा था। उसे याद आया कि बीस वर्ष पहले उसने उस पेड़ को एक छोटे-से पौधे के रूप में लगाया था। उसने उसे धूप से बचाया था, पानी दिया था, उसकी शाखाओं को सहारा दिया था और वर्षों में वह पौधा विशाल वृक्ष बन गया था। रणवीर फूट-फूटकर रो पड़ा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि पेड़ और जिंदगी में कितना गहरा रिश्ता है—दोनों को बनाने में वर्षों लगते हैं, लेकिन नष्ट करने में एक क्षण भी नहीं लगता। उसी क्षण उसके भीतर एक और सवाल उठा—क्या यह वही स्वाभिमान था जिस पर उसे गर्व था? क्या यही वह इज्जत थी जिसके लिए उसने पूरी जिंदगी संघर्ष किया? या फिर स्वाभिमान कब अहंकार में बदल गया, उसे पता ही नहीं चला? पुलिस पहुँची तो रणवीर ने कोई विरोध नहीं किया। उसने स्वयं अपने हाथ आगे कर दिए। एक अधिकारी ने उससे पूछा—“आपने ऐसा क्यों किया?” रणवीर ने बहुत देर तक कोई उत्तर नहीं दिया। फिर उसकी आवाज काँप उठी—“मैं समझ रहा था कि मैं अपने घर की इज्जत बचा रहा हूँ, लेकिन सच यह है कि मैंने अपने ही हाथों अपने घर की आखिरी दीवार गिरा दी।” पुलिस उसे लेकर चली गई। जाते समय उसने आखिरी बार पीछे मुड़कर अपने पेड़ों को देखा। नीम हवा में झूम रहा था, बरगद की शाखाएँ फैल रही थीं और अमलतास पर फूल खिले थे। उसे अचानक नंदिता याद आई। वर्षों से जिस बेटी से उसने संबंध तोड़ रखे थे, उसी बेटी की याद उस समय उसके सीने को चीर रही थी। उसने सोचा—“काश, उस दिन मैंने उसे माफ कर दिया होता। काश, मैंने उसके फैसले को समझने की कोशिश की होती। काश, आज मैंने अपने क्रोध को रोक लिया होता।” लेकिन जिंदगी में कुछ  वाकये ऐसे होते हैं जिनका कोई उत्तर नहीं होता। रणवीर जेल चला गया। अखबारों ने उसे हत्यारा लिखा। लोगों ने उसके पुराने सामाजिक कार्यों को याद किया। किसी ने कहा वह कभी बहादुर सैनिक था, किसी ने कहा वह समाजसेवी था, किसी ने कहा उसने पर्यावरण के लिए बहुत काम किया, लेकिन कानून की नजर में वह अब चार हत्याओं का आरोपी था और शायद उसकी सबसे बड़ी सजा जेल नहीं, बल्कि अपनी अंतरात्मा के साथ जीवन बिताना थी। जिस हाथ ने हजारों पौधे लगाए थे, उसी हाथ ने चार जिंदगियाँ उजाड़ दी थीं। जिस आदमी ने सीमा पर देश की रक्षा की थी, वह अपने भीतर के क्रोध से अपने परिवार की रक्षा नहीं कर पाया। जिस स्वाभिमान को उसने जीवन भर अपनी ताकत समझा था, वही स्वाभिमान जब बुद्धि से अलग हुआ तो विनाश का कारण बन गया। वर्षों बाद उसके लगाए पेड़ विशाल हो गए। लोग उनकी छाया में बैठते, पक्षी उनकी शाखाओं पर घोंसले बनाते और राहगीर कहते—“इन पेड़ों को किसी फौजी ने लगाया था।” लेकिन उन पेड़ों की छाया में एक ऐसी कहानी भी हमेशा जीवित रही जिसमें एक आदमी ने सीमा पर युद्ध जीते, समाज के लिए जीवन लगाया, धरती को हरा-भरा किया, लेकिन अपने ही भीतर लड़े जाने वाले सबसे कठिन युद्ध में हार गया!  उसने दुश्मनों के छक्के छुड़ाए थे, लेकिन अपने क्रोध के सामने हार गया था। उसने हजारों पेड़ लगाए लेकिन एक क्षण के आवेश में चार जिंदगियाँ काट डाली। उसने जिंदगी भर सम्मान कमाया लेकिन एक निर्णय ने उस सम्मान पर ऐसा दाग लगा दिया जिसे कोई अदालत, कोई पुरस्कार और कोई सफाई मिटा नहीं सकती थी।—स्वाभिमान आदमी को ऊँचा उठाता है, लेकिन जब स्वाभिमान बुद्धि को  खा जाता है तो वही आदमी को हवान बना देता है। जिंदगी बनाने में बरसों लगते हैं, रिश्ते बनाने में पूरी उम्र लग जाती है, लेकिन उन्हें मिटाने के लिए कभी-कभी एक क्षण ही काफी होता है। रणवीर के लगाए पेड़ आज भी खड़े थे, हवा चलती तो उनकी पत्तियाँ सरसरातीं, जैसे वे उस बूढ़े फौजी से कह रही हों—“तुमने हमें जीवन दिया था, लेकिन उस दिन अपने क्रोध को जीवन दे दिया; पेड़ बचाना सीख लिया, काश उस दिन अपने भीतर के आदमी को भी बचा लेते। डॉ राजेंद्र यादव आजाद मोबाइल 94 1427 128 8

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