मारूफ आलम 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक # आदिवासी# aadivasi#kavita 71601 0 Hindi :: हिंदी
तुम रहते हो सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी यहीं इन्ही जंगलों मे मगर तुम पर ये इल्जाम लगाते हैं सरकारी अमले कि तुमने काट कर जंगल विरान कर दिये और अपने घर जागीरों से भर दिये मगर मैं सोचता हूँ अगर तुमने या तुम्हारे पूर्वजों ने ये जंगल काटे हैं तो अभी तक ये जंगल बाकी क्यों हैं ये कब के खत्म हो जाने चाहिए थे मगर नही, तुमने तुम्हारे पूर्वजों ने सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी संजोया है इन्हें बिल्कुल अपने बच्चों की तरह सब जानते हैं तुम कौन हो क्या इतिहास है तुम्हारा आमतौर पर तुम्हे आदिवासी कहकर पुकारा जाता है तुम सच्चे रखवाले हो जंगलो के मगर तुम्हे बेवजह मारा जाता है वो भी सिर्फ इसलिये कि तुमने ना ही बेचे हैं जंगल और ना ही जागीरें बनाईं ना इमारतें खड़ी कीं,ना गलियां सजायीं बल्कि हासिये पर लाकर धकेले गये तुम रूखी रोटी,गंदा पानी,बेरोजगारी झेले गए तुम मगर तुमने बचाए रक्खा नदियों को,जंगल को कुदरत के घर आंगन को सलाम है तुम्हे,सलाम,लाल का भारत के हर लाल का सलाम मारूफ आलम